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अंतिम संस्कार प्रक्रिया एवम उसके विभिन्न कर्म Share on

अंतिम संस्कार विधि :-

॥ जय श्री राम ॥॥

हरे क्रष्णा हरे राम

हमारे उज्जैन में माचिवाल परिवार है ,उक्त परिवार की सेवाओं में से एक सेवा उल्लेखनीय है जब भी किसी खंडेलवाल के यहाँ म्रत्यु होती है तो उक्त परिवार के 3 भ्राता श्री ओम माचिवाल, श्री राधेश्याम माचिवाल, श्री अशोक माचिवाल को जेसे ही सुचना मिलती है वे उसके अंतिम संस्कार में पूरी मदद करते है. 
अभी 10 दिवसीय गणेश उत्सव मनाया गया 12 सितम्बर 24 को खंडेलवाल तकनीकी विकास समिति के द्वारा आयोजित आरती सेवा में उनका अभिनंदन किया गया. 
तब अंतिम सस्कार केसे करे पर श्री महेश जी झालानी जिनके परिवार का उज्जैन धर्मशाला  में बहुमूल्य योगदान रहा ने एक पुस्तक भेट की अंतिम संस्कार केसे करे ।
यह  प्रकाशन उनके सहयोग से सम्भव हो सका


जब हमें महसूस हो रहा हो की उस व्यक्ति की प्राण ज्योति जाने वाली है, (अंतिम समय) उस समय प्राणी को जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करायें, सामने तुलसी का पौधा एवं भगवान की मूर्ति रखें, घर का एक व्यक्ति गीता का पाठ करें (पूरा संभव न हो तो कम से कम 9 श्लोक) सभी सदस्य राम नाम जपें।

प्राणी को जहां सुलाना हो वहां उसके (उत्तर से दक्षिण की दिशा) हाथ से नीचे से ऊपर और गौमाता का गौमुत्र व गोबर लेकर चौका लगावें, फिर उस पर तिल, जौ, कुशा, गंगाजी की मिट्टी डालें और उसके उपर चटाई विछाये, यदि बड़ा बेटा मौजूद हो, अन्यथा अन्य बेटे की गोद में उस व्यक्ति का सर रखना चाहिये और बेटे के हाथ से उस व्यक्ति के मुंह में पंच रत्न, तुलसी का पत्ता,गंगाजल डालें, अंत में सीधा देवे दान धर्म करें।

प्राण निकलने के बाद मृतक के नाक-कान में रूई लगायें, मतृक का अंतिम संस्कार अगले दिन करना हो तो उसके पैर के अंगुठे को कच्चा सूत बांधें,हर एक घंटे में घी, हल्दी, नमक का लेप करें इससे मृतक का शरीर नरम रहताहै। रात में पेट फूले नहीं इसलिए उसके पेट पर साबूत नमक की पोटली रखें,शरीर तक चिटी न पहुंचे इसलिए चटाई के चारों तरफ हल्दी डालें पास में दीपक व अगरबत्ती लगावें । परिवार के सभी सदस्य मृतक को स्नान करावे अंत में बड़ा बेटा मिट्टी के घड़े से मृतक को नहलाये, जो जनेऊ पहनते हैं, उनको बदलते है, स्त्रियों  के लिए घर की सभी स्त्रिया  नहलाती है, और सुहागन खी को श्रृंगर करती है। चुंदड़ी या पीला ओढ़ायें । अर्थी के सामान के साथ एक लोटा व पीतल की थाली लाते हैं, उसी थाली में पिंड तैयार करते हैं।

उम्न के हिसाब से अर्थी तैयार करे, बड़ी उम्र वालों के लिए बैकूंठी तैयार की जाती है। वैकुंठी में लोटे, (5 तांबे के व 1 लोटा चांदी) का लगाते हैं, उस प्राणी के पडपोता होने से सोने की सीढ़ी चढ़ाते हैं।

परिवार के 4 सदस्य जो कंधा देते है वो मुंडन करवाकर स्नान करकेसफेद वस्त्र धारण करें, मृतक को अर्थी पर रखने के बाद परिवार वाले शाल ओढाले है। शाल पहले घर वाले फिर ससुराल वालों की, बेटा, भाई, पोता सभी के ससुरालव अन्य परिवार वालों की शाल ओढ़ावें। अर्थी पर गुलाल व गोपीचंदन डालें, फुलोंसे सजायें । सुहागन स्त्रयों को साड़ी ओढ़ावें व विधवा को शाल।

मृतक को सभी परिवार की महिलायें जो छोटी हैं 1 नारियल हाथ में लेकर अर्थी को फेरी देवे व पुरूष पुष्पमाला लेकर फेरी देवें व उसे चढ़ावें सभी चरण स्पर्श करें, अगर पति की मृत्यु हुई हो तो स्त्री  को फेरी दिलाते हैं, और उसकी चुड़ियां तुड़वाकर अर्थी के साथ देते हैं, अगर स्त्री की मृत्यु हुई हो तो पति उसकी मांग भरता है, घर की सभी महिलायें भी मांग भरती हैं, रोली का तिलक लगाती है।

उसी समय गेहं के आटे की 4 पिंड तैयार करें उसमें तिल, जौ, दाल,कुशा, 1-1 रुपये का सिक्का डालें 1 पिंड शव के हदयपर, 2 री पिंड (दरवाजे केथोड़ी दूर पर) तीसरी  विश्राम स्थान पर व 4थी चिता स्थान पर मृतक के हाथ का स्पर्श करके बाजू में रखें, हर समय मृतक का हाथ स्पर्श हो इस बीच घर से अग्नि प्रज्वलित  करके काली मटकी मे रखें एवं रस्सी से मटकी बांधे व नाई के हाथ में देवें, परिवार के 4 सदस्य अर्थी अपने कन्धों पर रखें, फिर राम नाम जपते हुए शमशान की तरफ बढें, शमशान जाते समय एक बार विश्राम किया जाता है, उस
समय पिन्ड को निकालकर उसके चार तुकड़े करके शव के चारों तरफ डाला जाता है, वहीं पर शव की दिशा बदलते है, और घर से अर्थी प्रस्थान होनें के बाद जो बहू सोरनी करती है वह शव का सभी सामान जैसे चटाई, कपड़े व बिखरे हुए फुल  वगैरह सब घर से बाहर ले जाकर फेंकती है ।

शमशान में पहुंचने के बाद यहां की विधि करवाकर पंडित के अनुसार अंतिम संस्कार करावें , बड़ा बेटा फेरी लगाकर अग्नि  लगाता है, और कपाल क्रिया भी होती है, घी की आहुती देते हैं । कपूर भी डालते हैं, शाम को जल व दूध रखते है चिता स्थान पर। चिता के चारों ओर बांस की रेखा खींचते हैं, और लकड़ी से श्रीराम लिखते हैं, घर के सभी सदस्य यहां तिल हाथ में लेकर 3 बार तिलांजली डालते हैं। इसके पहले इस बीच घर की लड़कियां घर की सफाई कर लेती है,और सभी महिलायें स्नान करेक तिलांजली देती है।

पहले दिन खाना समर्धी के घर से आता है, किसी के घर उड़द की दालरोटी, या किसी के घर खिचड़ी बनती है।

यह सामान दुकान से आता है। आटा, घी, उड़ददाल, नमक, साबुतमिर्च (लाल) भोजन बनने के बाद तुरन्त गौग्रास देते है, और भोजन के समय सभी को, नीम की पत्ती देते है, उसे कडू ग्रास कहते है । इस वक्त जवाई भोजन नही करता। तीसरे दिन अस्थिसंचय श्राद्ध होता है। उस दिन पूजा के चावल,काली तिल, जौ, गोपीचंदन, घी, तेल, पान, फूल, अगरबत्ती, सुपारी, दस पत्तल,दस दोने, कच्या सूत, ऊन का धागा, मिठाई, कागबली के लिए लकड़ी की तिपाई,लकड़ी की चार छड़ी, लकड़ी की छोटी पावडी 1, काला मिट्टी का घड़ा इस पर रखने के लिए 1 कपड़ा, स्त्री के समय लाल पुरुष के समय सफेद होता है।चांवल बनाने के बाद घड़े पर ढक्कन व बड़ा दिया (मिट्टी का) रखा जाता है, साथमें मिठाई रखते हैं । रेशर्मी मखमल के लाल कपड़े की थैली में अस्थियाँ ( फूल)तीसरे दिन 4 पिंडदान होते है, अस्थियां उठाने के बाद उस जगह रेत बिछाकर 3 पिंड रखते हैं, 4थी पिंड 1 कदम आगे उत्तर दिशा में गढ़ढा रखोदकर उसके ऊपर अस्थियों का कलश रखकर उस पर पिंडदान रखते है (यह चावल का बनता है)आते समय अस्थि कलश झाड पर बांधते है। चौथे दिन 4 पिंडदान होते हैं। पच दिन से 9वें दिन तक गेहूं का पिंडदान व दसवे दिन उड़द का पिंडदान होता है।औउसी दिन घर की शुद्धि होती है। ग्यारहवें दिन 32 पिंड बनायी जाती है और अधिक महीना हो तो 33 पिंड बनाये जाते हैं।750 ग्राम चावल का। 365 पिंड साल भर के लिये, अधिक महिना होने पर 395 उतनी ही तिलाजली देते हैं। जिनकी मृत्यु हुई है, उस प्राणी के पुराने कपड़े महा ब्राम्हण को देवें, ग्यारवे दिन नहा करके 1 लोटापानी लाया जाता है, उसके बाद ही भोजन बनता है । शाम को कीर्तन होता है बारहवें की पूजा घर पर होती है, पूजा का नाम सहपिन्डी उस दिन 4 पिंड बनाते है, और 1 पिन्ड नारियल के आकार की बनाते है और पूजा सामग्री वही रहती है.विशेष सामान 12 इंच चांदी का तार विष्णु भगवान की सोने की प्रतिमा-2, पिंड के पांचो कपड़ें 12 लोटे व 1 घड़ा गंगापूजन के लिए साड़ी, ब्लाउज, एक तांबे की परात तर्पण के लिए, या 5 या 7 पीढ़ीयों के नाम से तर्पण कराते हैं, उसी समय घरके सभी सदस्य ग्यारस देते हैं। लोटे पर मिठाई रखते हैं, वो ब्राम्हण को देते है, 13ब्राम्हण भोजन करते है, 12 व्राम्हण को भोजन के बाद बिदा कर देते हैं. सभी को कपड़े, चप्पल, आसन, माला बाकी यथाशक्ति जो देना है । बाकी 1 पंडित के सुख सेज के लिए पलंग, पांच बर्तन, छाता, जूता, कंदील, स्वर्णदान, बाकीयथाशक्ति। शाम को गरुड़पुरान की बिदाई होती है ।

शाम को गरुड़ पुरान की बिदाई के बाद जो क्रिया कर्म करवाता है वो स्नान करके नये वस्त्र पहनकर चौकी पर बैठता है और फिर पगडी रस्म होती है। पगड़ी सबसे पहले मामा के घर की बाद में स्वयं के ससुराल की उसके बाद सभी रिश्तेदार यथा शक्ति देते हैं । बाद में बहन आरती करती है बाद में सभी आये हु ये मेहमान व घर के पुरूष वर्ग मंदिर जाते हैं, साथ में घर की लड़कियां भी जाती है 1 कटोरी में चावल लेकर और वहाँ से लौटते समय हरी सब्जी  लाते है।शाम को हरी सब्जी रोटी बहन या बेटी बनाती हैं, उसे शगुन देते हैं, (सभी क्रियाकर्मकरते समय नाई, पंडित दोनों ही जरूरी हैं ) महिला के समय पगड़ी रस्म  नहीं होती। 6 माई की पूजा सामग्री वो ही रहती है । इसमें 9 पिंड बनते हैं, और 8 ब्राम्हण जीमते है, 1 ब्राम्हण को पांच कपड़े बाकी को

यथाशक्ति।

बरसी साड़े ग्यारह महीने में होती है, उसमें 4 पिंड होती है, 8 ब्राम्हण जीमतेहै।7 बाम्हणों को 1-1 गिलास देते हैं, और 1 ब्राम्हण को यथाशक्ती ।
नारायणबलि, अपघाती म्रत्यु , जवान और जो लम्बी बिमारी से जाता है, उसके लिये की जाती है,

नारायणबलि ग्यारवे  दिन होती है। पहले नारायणबलि और बाद में ग्यारहवेंका काम होता है नारायणबलि में 6 ब्राम्हण  उसी में 1 प्रमुख ब्रम्हा, विष्णु, महेश,यम और प्रेत इनके मनाने को माला पाठ करते है। नारायण बलि करवाते समय10 बार स्नान करना पड़ता है, हवन तर्पण  होता है। जन्म से 4 साल के बच्चो  का दाह संस्कार (मिट्टी में करते हैं) उनका 3 दिन में सब कार्य हो जाता है।


शादी शुदा कन्या का सूतक पिता के घर 3 दिन तक मानते हैं.पंचक शांति के लिए (शनिवार को) आधा गिलास दूध की खीर, रेती,ईट, हवन के लिए, कुंकू, पान, फूल, सुपारी, पंचामृत, तुलसी, दुबी, मौली,शक्कर 100 ग्रा.. गंगा जल, गोमुत्र, उड़द 40 ग्राम, दही 50 ग्राम, मसुर दाल 25 ग्राम.


नवमें दिन की पूजा सामग्री

काली तिल - 40 ग्राम
जौ - 40 ग्राम
पत्तल - 4,5, दोना - 5

 

कच्चा दूघ - 200 ग्राम, दही- 100 ग्राम, शहद - 25 ग्राम, शक्कर - 25 ग्राम घी- 50 ग्राम, तेल -25 ग्राम, कच्चा सूत, ऊन का धागा, 200 ग्राम उड़द का आटा,पान, फूल, राल - 10 ग्राम, गंगा जल या गोमुत्र, सूखा आंवला या आंवला कंठी,नारियल तेल - 25 ग्राम, मिठाई - 50 ग्राम, सुपारी 9, सिक्के 4-5, थाली,लोटा, बाल्टी, 150 ग्राम गेहंर का आटा, गोबरी, माचिस।

ग्यारहवें की पूजा सामग्री

1 तांबे की परात, डेढ़ किलो जौ का आटा, 750 ग्राम चावल, काली तिल्ली-50ग्राम, कच्ा दूध - 240 ग्राम, दहीं-100 ग्राम, शहद 50 ग्राम, घी - 50 ग्रामतेल-40 ग्राम, शक्कर-100 ग्राम, मिठाई - 100 ग्राम, कच्चा सूत, गुन्डी धागा,ऊन का धागा - 2 मीटर, 14 पत्तल, 2 लोटे, थाली, बाल्टी, गोबरी, दीप 60 नग,पान - 40 नग, गोपीचंदन, फूल ज्यादा मात्रा में।

 

1 कर्म करते समय पूजा करने वाले की दिशा दक्षिण में होना चाहिये।
2 2. उल्टे हाथ से पोछा इसलिए नहीं लगाते क्योकि अंतिम समय उल्टे हाथ से पोछा लगाकर सुलाते हैं।

3. रसोई में लोटा नहीं लेते क्योकि 3, 10, 11 वे  दिन जब पानी का लोटा आताहै उसी समय खाना बनता है।

4. किसी व्यक्ति के घर से तुरन्त निकलते ही झाड़ु पोंछा नही करना चाहिये । क्योंकि शव को घर से ले जाने के बाद तुरन्त झाड़ु पोछा करते है।


5. थाली में 3 रोटी नहीं देना चाहिये क्योंकि 3 रोटी तिये वाले दिन जो 4 लोग पहले कन्धा देते है, उन्हें परोसते हैं।

6 जो लोग मुंडन करवाते हैं, वो बाल अर्थीं में नीचे की ओर बांधकर साथमें देते हैं।

7. मेंहदी की थाली व पूजा की थाली तुरन्त नहीं धोना चाहिये, क्योंकिबारहवें दिन थाली तुरन्त धोते हैं, जब पगड़ी रस्म होती है, उसी समयघर की सुहागन महिलायें मेंहदी का नख करती हैं।


৪. गरूड़पुराण तीसरदिन से रोज होता है, सिर्फ ग्यारवें दिन नहीं होता।

9. तीसरे दिन से नवें दिन तक रोज उसी स्थान पर दिया लगाते हैं, घर की बहु  को दीया जलानी चाहिये सिर्फ बत्ती भर गिली होनी चाहिये।

10. 14 दिन दोपहर को सभी घर की महिलायें बैठकर बाल संवारती है, तेल, कंघा, बहन बेटी लाती हैं।

11  परिवार वाले 12 दिन तक पलंग पर नहीं सोते घर की महिलायें बिंदी नहीं लगाती, उपवास नहीं करना चाहिये।

12, धी. तेल और दूध दही एक साथ घर से नहीं ले जाते।

13, एक फेरी सिर्फ शव की लगाते हैं इसलिए मंदिर में 1 फेरी नहीं लगाते।

14, रोज गौग्रास देना चाहिये, भिखारी को रोज जिमावें।

15. तीसरे दिन अस्थियां लेकर घर के सदस्य इलाहाबाद जाते हैं।

16. शव को जंवाई फेरी नहीं लगाता।

17. सवा महिने बाद घर की महिलायें मंदिर जाती हैं।

18, घर के सदस्य किसी को भी बारहवें दिन तक प्रणाम नहीं करते।

19. मृतक को तीसरे साल श्राद्ध में मिलाते है।

20. भोजन की थाली व पानी एक साथ नहीं देते क्योंकि गौग्रॉस देते समय लेजाते हैं।

21. तेरहवें दिन सब परिवार वालों का भोजन एक साथ बनता है उसे उजली रोटी कहते है। भोजन सादा दाल, चांवल, कढ़ी, फलके व सब्जी बनती है

22, पन्द्रहवें दिन घर की बेटी स्वयं थोड़ा आटा, गुड तेल लेकर आती है उसकाहलवा बना कर कुत्ते को देती है। ( कढाई का नेग)

23. बिना ब्लाउज की साड़ी किसी को भी नही देते क्योंकि जो स्त्री विधवा होतीहै। उसको उसका भाई पगड़ी रस्म के पहले देता है साथ में चुंड़ी भी।


24, सुहागन सतीया3,9, 12 दिल या ही थोली।

25, आटे के लड्डू बनाते समय  मेवा  या इलायची  डालना चाहिए सादे नही बनाना चाहिए क्योकि विधवा होने के बाद जब स्त्री पहली बार पियर जाती है तो उसे साड़े लड्डू देते है।

26, गोग्रास देने के पहले कपडे नही थोते।

27. बारवें के समय जो लोटे में कपडा बांधते   है वो पुरुष के समय सफ़ेद व् स्त्री के समय लाल बांधते है।

28. कीर्तन के समय ( 9 वे  को) या गंगापूजन के समय (12 वे ) को जो आरती होती है, यो पूरी नही गाते, 3-4 लाईन ही गाते हैं।

पितरों में मिलाना :-

पार्वण या महालय श्राद्ध कहते है। तीसरे वर्ष यह कम्म होता है। इसमें पुरुखा नाम के विड्व देव की पूजा और पिंड की संख्या 4 से लेकर सभी और 11-12 या16 पर्यंत भी है।

इसमें भी -

1 सोने की विष्णु प्रतिमा

1नया ताम्बे का लोटा


1 नई ताम्बे की प्लेट

5 कपड़े

बाकी सब समान बारवें के पूजा के जैसे।


सादर प्रस्तुती 
डॉ अशोक खंडेलवाल चिकित्सा संसार 
सामग्री संकलन सहयोगी 
श्रीमति प्रमिला-श्रीकिशन भागला रामसागर पारा रायपुर

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