History

श्राद्ध,पिंड दान और गयाजी Share on

 

श्राद्ध,पिंड दान और गयाजी 

 

श्राद्ध पक्ष के समय क्यों नहीं किए जाते हैं शुभ कार्य ? 
उज्जैन से-
श्राद्ध पितृत्व के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं। सनातन धर्मानुसार प्रत्येक शुभ कार्य के आरंभ करने से पहले में मां-बाप तथा पितृगण को प्रणाम करना हमारा धर्म है। क्योंकि हमारे पुरखों की वंश परंपरा के कारण ही हम आज जीवित रहे हैं। सनातन धर्म के मतानुसार हमारे ऋषिमुनियों ने हिंदू वर्ष में सम्पादित 24 पक्षों में से एक पक्ष को पितृपक्ष अर्थात श्राद्धपक्ष का नाम दिया। पितृपक्ष में हम अपने पितृगण का श्राद्धकर्म, अर्ध्य, तर्पणतथा पिण्डदान के माध्यम से विशेष क्रिया संपन्न करते हैं। धर्मानुसार पितृगण की आत्मा को मुक्ति तथा शांति प्रदान करने हेतु विशिष्ट कर्मकाण्ड को 'श्राद्ध' कहते हैं। श्राद्धपक्ष में शुभकार्य वर्जित क्यों: हमारी संस्कृति में श्राद्ध का संबंध हमारे पूर्वजों की मृत्यु की तिथि से है। अतः श्राद्धपक्ष शुभ तथा नए कार्यों के प्रारंभ हेतु अशुभ काल माना गया है। जिस प्रकार हम अपने किसी परिजन की मृत्यु के बाद शोकाकुल अवधि में रहते हैं तथा शुभ, नियमित, मंगल, व्यावसायिक कार्यों को एक समय अविधि तक के लिए रोक देते हैं। उसी प्रकार पितृपक्ष में भी शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है। श्राद्धपक्ष की 16 दिनों की समय अवधि में हम अपने पितृगण से तथा हमारे पितृगण हमसे जुड़े रहते हैं। अत: शुभ-मांगलिक कार्यों को वंचित रखकर हम पितृगण के प्रति पूरा सम्मान व एकाग्रता बनाए रखते हैं।

धर्मशास्त्रों के मतानुसार पितृऋण: शास्त्रों के अनुसार मनुष्य योनी में जन्म लेते ही व्यक्ति पर तीन प्रकार के ऋण समाहित हो जाते हैं। इन तीन प्रकार के ऋणों में से एक ऋण है पितृऋण अत: धर्मशास्त्रों में पितृपक्ष में श्राद्धकर्म के अर्ध्य, तर्पण तथा पिण्डदान के माध्यम से पितृऋण से मुक्ति पाने का रास्ता बतलाया गया है।

पितृऋण से मुक्ति पाए बिना व्यक्ति का कल्याण होना असंभव है। शास्त्रानुसार पृथ्वी से ऊपर सत्य, तप, महा, जन, स्वर्ग, भुव:, भूमि ये सात लोक माने गए हैं। इन सात लोकों में से भुव: लोक को पितृलोक माना गया है।

श्राद्धपक्ष की सोलह दिन की अवधी में पितृगण पितृलोक से चलकर भूलोक को आ जाते हैं। इन सोलह दिन की समयावधि में पितृलोक पर जल का अभाव हो जाता है, अतः पितृपक्ष में पितृगण पितृलोक से भूलोक आकार अपने वंशजो से तर्पण करवाकर तृप्त होते हैं। अतः यह विचारणीय विषय है कि जब व्यक्ति पर ऋण अर्थात कर्जा हो तो वो खुशी मनाकर शुभकार्य कैसे सम्पादित कर सकता है। पितृऋण के कारण ही पितृपक्ष में शुभकार्य नहीं किए जाते। पितृऋण से मुक्तिः शास्त्र कहते हैं की पितृऋण से मुक्ति के लिए श्राद्ध से बढ़कर कोई कर्म नहीं है। श्राद्धकर्म का अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में सर्वाधिक महत्व कहा गया है। इस समय सूर्य पृथ्वी के नजदीक रहते हैं, जिससे पृथ्वी पर पितृगण का प्रभाव अधिक पड़ता है इसलिए इस पक्ष में कर्म को महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रों के अनुसार एक श्लोक इस प्रकार है।

एवं विधानतः श्राद्धं कुर्यात् स्वविभावोचितम्। आब्रह्मस्तम्बपर्यंतं जगत् प्रीणाति मानवः ॥

अर्थात् - जो व्यक्ति विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, वह ब्रह्मा से लेकर घास तक सभी प्राणियों को संतृप्त कर देता है तथा अपने पूर्वजों के ऋण से मुक्ति पाता है। अतः स्वयं पर पितृत्व के कर्जों के मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

श्राद्ध पिंडदान 

 

जन्म और म्रत्यु एक अकाट्य सत्य है. म्रत्यु के बाद श्राद्ध और पिंडदान का महत्व है. 

मान्यता है की पितरो की आत्मा को जब तक मोक्ष नही मिलता वे भटकती रहती है और हमारे जीवन में उसका प्रभाव पड़ता है. 

इसलिए परिवार के सभी मृतक का श्राद्ध में लिया जाना और उसके बाद गया तीर्थ में जाना एसा विधान है. 

प्रस्तुत जानकारी सभी के सामान्य ज्ञान के लिए है इसमें अलग अलग मान्यताएं,विश्वास हो सकते है. 

गया जी के साथ अनेक मोक्ष तीर्थ शेत्र कहे गये है जेसे उज्जैन आदि. 

पर मूल महत्व गयाजी का है

 

पितृ पक्ष का प्रारंभ भाद्रपद पूर्णिमा और समापन आश्विन अमावस्या के दिन होता है.. पितृ पक्ष के 16 दिन पितरों को तृप्त करने और उनको प्रसन्न करने के लिए होते हैं. पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने पितरों को याद कर तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध, दान, ब्राह्मण भोज, पंचबलि आदि करते हैं. ऐसा करने से पितर खुश होते हैं और तृप्त होकर आशीर्वाद देते हैं. हालांकि, श्राद्ध तर्पण मृत्यु की तिथि पर ही करने का विधान है.

 

गया जाने से पहले और वहां जाने के बाद, इन बातों का ध्यान रखना चाहिए: 

  • मान्यता है कि पितरों का गया में पिंडदान करने से पहले पटना ज़िले की पुनपुन नदी में स्नान करके पिंडदान करना ज़रूरी है.
  • गया में पिंडदान करने के लिए कई नियमों का पालन करना होता है. जैसे कि, श्राद्ध भूमि को नमस्कार करना, एकांतवास करना, जमीन पर सोना, पराया भोजन न करना, पितरों का स्मरण करना, और देवता स्मरण में रहना.
  • ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर और व्यंजनों की प्रशंसा किए बिना कराना चाहिए.
  • जो पितर शस्त्र आदि से मारे गए हों, उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अलावा चतुर्दशी को भी करना चाहिए.
  • पिंडदान पर साधारण या नीच लोगों की नज़र पड़ने से वह पितरों तक नहीं पहुंचता.
  • गया जाने के बाद भी श्राद्ध और तर्पण करते रहना चाहिए.
  • अगर गया जाने में समय या धन की समस्या है, तो माथा टेककर सामर्थ्य के मुताबिक दान कर देना चाहिए.
  • घर में श्रद्धा के साथ पितरों के लिए श्राद्ध किया जा सकता है.

 

 

किसी भी परिजन की मृत्यु के एक साल बाद भरणी श्राद्ध करना जरूरी है. अविवाहित मरने वाले लोगों का श्राद्ध पंचमी तिथि में करते हैं और उस दिन भरणी नक्षत्र हो तो और भी अच्छा होता है

 

बिहार में स्थित गया को पितरों की मुक्ति के लिए शीर्ष तीर्थ स्थल माना गया है। ऐसे में गया में मृत व्यक्ति का पिंडदान करने से उस व्यक्ति की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है. 

गयाजी पटना के नजदीक है अतएव जिन्हें ट्रेन से जाना है वे पटना पहुच गयाजी जा सकते है 

पिंडदान गया: गयाजी में पिंडदान कब और कहां करें


 

पिंडदान  एक बहुत ही पवित्र हिंदू समारोह है जिसमें अपने मृत पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करना शामिल है। यह प्राचीन समारोह न केवल हमें अपने पूर्वजों से अधिक जुड़ाव महसूस करने में मदद करता है, बल्कि यह हमारे स्वयं के विकास, बुरे कर्मों के उन्मूलन और हमारे लक्ष्यों की पूर्ति के लिए भी द्वार खोलता है। बिहार में गया को पिंडदान करने के लिए दुनिया के सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। गया में पिंडदान करते समय , इसके अर्थ, इसके महत्व, पंडितों की भूमिका और इससे जुड़ी लागतों के बारे में जानकारी प्राप्त करना महत्वपूर्ण है, और यह जानकारी नीचे सूचीबद्ध है।



गया में पिंडदान कब करें



 

गया में पिंडदान के लिए लोग साल भर आते हैं, लेकिन गया में पिंडदान करने का सबसे शुभ समय पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष के दौरान होता है। पितृपक्ष 15-15 दिन की अवधि है जो आमतौर पर सितंबर या अक्टूबर में पड़ती है। ऐसा माना जाता है कि इस अवधि के दौरान, हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं और हम जो भी तर्पण करते हैं, वह सीधे उन तक पहुंचता है। पितृपक्ष के दौरान दुनिया भर से लाखों लोग गया आते हैं और इसलिए आपको अच्छे आवास और पुजारी मिलने में कठिनाई हो सकती है। आप अंतिम समय की भीड़ से बचने के लिए अपनी यात्रा की योजना बना सकते हैं।

 

गया पिंडदान का महत्व



 

  1. दिवंगत आत्माओं के लिए आध्यात्मिक मुक्ति या मोक्ष: गया में पिंडदान से जुड़े  अंतिम लाभों में से एक आध्यात्मिक मुक्ति या मोक्ष की प्राप्ति है। इस पवित्र अनुष्ठान को करने से, व्यक्ति अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्माओं को जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाने की कोशिश करते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब पूर्वजों की आत्माएं मोक्ष पाती हैं, तो वे बदले में, अपने दिव्य अनुग्रह से कर्ता को आशीर्वाद देते हैं। जीवित और मृत दोनों के लिए, यह अनुष्ठान एक परिवर्तनकारी यात्रा के रूप में कार्य करता है जो आध्यात्मिक उन्नति और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति का द्वार खोलता है।
  2. बुरे कर्मों का उन्मूलन: हिंदू धर्म में माना जाता है कि हम जो भी कार्य करते हैं, वह हमारी आत्मा पर एक छाप छोड़ता है, जिसे कर्म कहा जाता है। सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के कर्मों का संचय हमारे जीवन की परिस्थितियों और भविष्य के अनुभवों को प्रभावित करता है। गया पिंडदान को हमारे वंश से जुड़े नकारात्मक कर्मों को खत्म करने का एक शक्तिशाली साधन माना जाता है।
  3. अपने पूर्वजों का आशीर्वाद लें: माना जाता है कि गया में पिंडदान करने से हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है। यह हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का एक गहरा कार्य है, जो हमारे अस्तित्व को आकार देने में उनकी भूमिका को स्वीकार करते हैं। इस अनुष्ठान के माध्यम से हमारे पूर्वजों द्वारा दिया गया आशीर्वाद हमारे जीवन में सुरक्षा, मार्गदर्शन और आध्यात्मिक सहायता ला सकता है। उनकी दयालु उपस्थिति जीवन की चुनौतियों से निपटने और समग्र कल्याण को बढ़ावा देने में मदद कर सकती है।
  4. इच्छाओं की पूर्ति: माना जाता है कि गया पिंडदान में दिल की इच्छाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने की शक्ति होती है। ऐसा कहा जाता है कि इस अनुष्ठान को ईमानदारी और भक्ति के साथ करने से व्यक्ति अपने सपनों को साकार करने में दैवीय हस्तक्षेप और सहायता प्राप्त कर सकता है। माना जाता है कि पूर्वजों की आत्माओं का सम्मान और उन्हें प्रसन्न करने का कार्य सकारात्मक ऊर्जा और आशीर्वाद उत्पन्न करता है जो व्यक्तिगत और आध्यात्मिक लक्ष्यों की पूर्ति में सहायता कर सकता है।

 

क्या बेटियां गयाजी पिंडदान कर सकती हैं?

हां, बेटियां या परिवार की कोई भी महिला सदस्य गया पिंडदान अनुष्ठान कर सकती हैं। ऐसा माना जाता है कि सीता माता ने एक बार अपने ससुर राजा दशरथ के लिए गया में पिंडदान किया था। आप मंदिर में और उसके आस-पास महिलाओं को अपने पूर्वजों के लिए गया श्राद्ध करते हुए पाएंगे।



 

गया में कितने स्थानों पर पिंडदान करना चाहिए?



 

पितृपक्ष के दौरान लोग 15 दिनों तक गया में रहते हैं और अलग-अलग जगहों पर अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान करते हैं। गया में पिंडदान करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थान विष्णुपद मंदिर है। जो लोग एक दिन में पिंडदान की रस्म पूरी करना चाहते हैं, वे 3 जगहों पर पिंडदान करते हैं - विष्णुपद मंदिर, फाल्गुनी नदी और अक्षय वट वृक्ष। ये तीनों जगहें पास-पास हैं और इन सभी जगहों पर पिंडदान पूरा करने में लगभग तीन से चार घंटे लगते हैं।



 

 

गयाजी पिंडदान की प्रक्रिया

 

श्राद्ध या पिंडदान की प्रक्रिया सुबह 7 बजे से शुरू होकर सूर्यास्त से पहले शाम तक चलती है। सबसे पहले पिंडदान करने वाला व्यक्ति होटल या धर्मशाला में स्नान करके विष्णुपद मंदिर आएगा। उसे अपने साथ एक सफ़ेद धोती ले जानी होगी जिसे वह पूजा के समय पहनेगा। पंडित जी सभी अन्य सामग्री की व्यवस्था करेंगे और पूजा की शुरुआत संकल्प से होगी जिसमें सभी पूर्वजों के नाम लिए जाएँगे। फिर व्यक्ति चावल के गोले बनाता है और एक-एक करके चावल के गोले जिन्हें पिंड भी कहा जाता है, अपने पूर्वजों को अर्पित करता है। पिंडदान की रस्म पूरी करने के बाद, पंडित जी पिंड/चावल के गोले को ले जाकर भगवान विष्णु, विष्णुपद के चरणों में रखने के लिए कहेंगे।

 

गयाजी पिंडदान की लागत


 

गया जी में पिंडदान का सामान्य शुल्क निजी पूजा के लिए लगभग 3000 रुपये है। यदि कोई समूह में पिंडदान करना चाहता है, तो शुल्क लगभग 500 रुपये है। शुल्क में पुजारी दक्षिणा और सामग्री शुल्क शामिल है, हालांकि, विष्णुपद मंदिर के अंदर, पुजारी आपसे भगवान विष्णु के चरणों में पिंड रखने के समय कुछ अतिरिक्त राशि दान करने के लिए कह सकते हैं। गया जाने से पहले किसी स्थान से अनुष्ठान की बुकिंग करवाना उचित है क्योंकि इससे पूजा के समय सौदेबाजी और धोखाधड़ी की संभावना से बचने में मदद मिलती है।

 

निष्कर्ष


गयाजी पिंडदान करना   अपने पूर्वजों के प्रति भक्ति और श्रद्धा का कार्य है, और गया पिंडदान से जुड़ी लागत आध्यात्मिक लाभ और इस पवित्र अनुष्ठान से मिलने वाली संतुष्टि की गहरी भावना के लिए चुकाई जाने वाली एक छोटी सी कीमत है। आखिरकार, गया पिंडदान का महत्व हमारे वंश के साथ स्थापित होने वाले गहरे संबंध और हमारे दिवंगत पूर्वजों का सम्मान करने और उनसे आशीर्वाद लेने के अवसर में निहित है।

 

 

पिंड दान क्या होता है, और क्यों क्या जाता है?

 

पिंडदान मरे हुए इंसान के नाम पर पण्डित महाराज जी जो कुछ अपने यजमान को बताते हैं। वही सब करना होता है। हमारे बजुर्गो ने हमें सिखाया पिंडदान करना ताकि हमारे पितृ तृप्त हो जाये, मार्कण्डेय पुराण में रुचि और उनके मरे हुए रिश्तादारो ने की वार्तालाप हुई। ये जानकारी पवित्र श्रीमद् भगवत गीता में भी  है

लेकिन मैंने पवित्र गीता जी अध्याय 9 के श्लोक में 25 में कहा:— यान्ति देवव्रता:,देवान, पितृन, यान्ति, पितृव्रता:, भूतानि, यान्ति, भूतेज्या:, यान्ति, मद्याजिन:, अपि, माम।। २५।। अनुवाद:— देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं (और) मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं। (इसलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता।)

पवित्र गीता जी अध्याय 9 के श्लोक 24 में गीता ज्ञान दाता ने कहा कि:— अहम, हि, सर्वयज्ञानाम्, भोक्ता, च, प्रभु:, एवं, च, न, तु, माम, अभिजानन्ति, तत्वेन, अत:, च्यवन्ति, ये।।२४।। अनुवाद:— क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूं; परन्तु वे मुझ परमेश्वर को तत्व से नहीं जानते, इसी से गिरते हैं अर्थात पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं।-----

-----------------------------------------------------------------------------------

*श्राद्ध क्या है संपूर्ण जानकारी ।*

श्राद्ध दो प्रकार के होते है ,
1)पिंड क्रिया
2) ब्राह्मणभोजन

1)पिण्डक्रिया*
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि श्राद्ध में दी गई अन्न सामग्री पितरों को कैसे मिलती है...?

नाम गौत्रं च मन्त्रश्च दत्तमन्नम् नयन्ति तम्।
अपि योनिशतम् प्राप्तान्सतृप्तिस्ताननुगच्छन्ति ।।
(वायुपुराण)

श्राद्ध में दिये गये अन्न को नाम , गौत्र , ह्रदय की श्रद्धा , संकल्पपूर्वक दिये हुये पदार्थ भक्तिपूर्वक उच्चारित मन्त्र उनके पास भोजन रूप में उपलब्ध होते है ,

*2)ब्राह्मणभोजन*

निमन्त्रितान् हि पितरः उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान् ।
वायुवच्चानुगच्छन्ति तथासिनानुपासते ।।
(मनुस्मृति 3,189)

अर्थात् श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मण में पितर गुप्तरूप से प्राणवायु की भांति उनके साथ भोजन करते है , मृत्यु के पश्चात् पितर् सूक्ष्म शरीरधारी होते है , इसिलिये वह दिखाई नही देते ,

*तिर इव वै पितरो मनुष्येभ्यः*
( शतपथ ब्राह्मण )
अर्थात सूक्ष्म शरीरधारी पितर् मनुष्यों से छिपे होते है ।

*धनाभाव में श्राद्ध*

धनाभाव एवम् समयाभाव में श्राद्ध तिथि पर पितर का स्मरण कर गाय को घांस खिलाने से भी पूर्ति होती है , यह व्यवस्था पद्मपुराण ने दी है ,
यह भी सम्भव न हो तो इसके अलावा भी , श्राद्ध कर्ता एकांत में जाकर पितरों का स्मरण कर दोनों हाथ जोड़कर पितरों से प्रार्थना करे

न मेस्ति वित्तं न धनम् च नान्यच्छ्श्राद्धोपयोग्यम् स्वपितृन्नतोस्मि ।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयोतौ कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य ।।
(विष्णुपुराण)

अर्थात ' है पितृगण मेरे पास श्राद्ध हेतु न उपयुक्त धन है न धान्य है मेरे पास आपके लिये ह्रदय में श्रद्धाभक्ति है मै इन्ही के द्वारा आपको तृप्त करना चाहता हूं आप तृप्त होइये
(If the person has all things to perform shrAddha and still says this, it will be a deceiving and manes will get angry)

श्राद्ध सामान्यतः 3 प्रकार के होते है

*नित्य नैमितकम् काम्यम् त्रिविधम् श्राद्धम् उच्यते*
यम स्मृति में 5 प्रकार तथा , विश्वामित्र स्मृति में 12 प्रकार के श्राद्ध का वर्णन है ,किंतु 5 श्राद्ध में ही सबका अंतर्भाव हो जाता है ,

1)नित्य श्राद्ध*
प्रतिदिन किया जानेवाला श्राद्ध , जलप्रदान क्रिया से भी इसकी पूर्ति हो जाती है

2)नैमितकम श्राद्ध*
वार्षिक तिथि पर किया जानेवाला श्राद्ध ,

3)काम्यश्राद्ध*
किसी कामना की पूर्ति हेतु किया जानेवाला श्राद्घ

4)वृद्धिश्राद्ध (नान्दीश्राद्ध)*
मांगलिक कार्यों , विवाहादि में किया जानेवाला श्राद्ध

5)पावर्ण श्राद्ध*
पितृपक्ष ,अमावस्या आदि पर्व पर किया जानेवाला श्राद्ध

श्राद्ध कर्म से मनुष्य को पितृदोष-ऋण से मुक्त के साथ जीवन मे सुखशांति तो प्राप्त होती है , अपितु परलोक भी सुधरता है

*पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिताहि परमम् तपः।*
*पितरि प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्व देवताः।।*
*सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता।मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत्*

इस सृष्टि में हर चीज का अथवा प्राणी का जोड़ा है, जैसे: रात और दिन, अँधेरा और उजाला, सफ़ेद और काला, अमीर और गरीब अथवा नर और नारी इत्यादि बहुत गिनवाये जा सकते हैं।

सभी चीजें अपने जोड़े से सार्थक है अथवा एक-दूसरे के पूरक है, दोनों एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं, इसी तरह दृश्य और अदृश्य जगत का भी जोड़ा है, दृश्य जगत वो है जो हमें दिखता है और अदृश्य जगत वो है जो हमें नहीं दिखता, ये भी एक-दूसरे पर निर्भर है और एक-दूसरे के पूरक हैं।
मित्रों, पितृ-लोक भी अदृश्य-जगत का हिस्सा है और अपनी सक्रियता के लिये दृश्य जगत के श्राद्ध पर निर्भर है।

सनातन धर्मग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं, ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है, वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।

पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है, इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है, श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए।

पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्ष भर तक प्रसन्न रहते हैं, धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।

श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे, इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं, यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।

श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं, मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं, आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं:

1- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए, यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं, दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।

2- श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है, पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है, पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।

3- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।

4- ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।

5- जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए, इससे वे प्रसन्न होते हैं, श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए, पिंड दान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।

6- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं, ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।

7- श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटरसरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है, तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है, वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं, कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।

8- दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए, वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है, अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।

9- चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।

10- जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहने वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।

11- श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदर-पूर्वक भोजन करवाना चाहिए, जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।

12- शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग) में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए, धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है, अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।

13- श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं, श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।

14- रात्रि को राक्षसी समय माना गया है, अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए, दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए, दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।

15- श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं: गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल, केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है।
सोने, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं, इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।

16- तुलसी निर्माल्य से पितृगण प्रसन्न होते हैं, ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं, तुलसी निर्माल्य से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।

17- रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं, आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।

18- चना, मसूर, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।

19- सनातन धर्म के भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ
20- श्राद्ध के प्रमुख अंग इस प्रकार :
तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है, श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।

भोजन व पिण्ड दान-- पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है, श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।
वस्त्रदान-- वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।
दक्षिणा दान-- यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।

21 - श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें, श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।

22- पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान्न जैसे खीर आदि है, इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।

23- तैयार भोजन में से गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें, इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।

24- कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं।
इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं, पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।

25- ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं, ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।

26- पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए, पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है, पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए, एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राध्दकर्म करें या सबसे छोटा 

 

 

|| श्राद्ध के कुछ नियम || 

 

श्राद्ध का सबसे उपयुक्त समय है "कुतुप बेला"‌ है। दिन का आठवाँ मुहूर्त "कुतुप काल" कहलाता है। दिन के लगभग अपराह्न 11:36 से लेकर दोपहर 12:56 तक का समय श्राद्ध कर्म के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है और इसे ही कुतुप काल कहते हैं। इसी समयावधि में अपने पितरों के निमित्त धूप जलाएं, तर्पण करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएं। गाय, कौवां, स्वान को भी कुछ खाने को जरूर दें।

 

???? सबसे पहले सुबह जल्दी स्नान करने के उपरांत भगवान सूर्य नारायण को जल अर्पित करें और सूर्यनारायण भगवान से अपने  पितरों की मुक्ति की प्रार्थना करें।

 

????श्राद्ध की संपूर्ण प्रक्रिया दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके की जाए तो बहुत अच्छा माना जाता है, क्योंकि पितर-लोक को दक्षिण दिशा में बताया गया है।

 

???? श्राद्ध क्रिया में सफेद या पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं, ऐसा करने से पितर प्रसन्न होते हैं व समस्त मनोरथों को प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं।

 

????पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध या तर्पण करते समय काले तिल का प्रयोग भी करना चाहिए, क्योंकि शास्त्रों में इसका बहुत महत्व माना गया है।

 

???? श्राद्ध के दिनो पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। श्राद्ध के दिन क्रोध, चिड़चिड़ापन और कलह से दूर रहें। तामसिक भोजन लहसुन प्याज जैसी वस्तुओं से परहेज करें।

 

???? यदि संभव हो सके तो पितरों को भोजन सामग्री देने के लिए पीतल, चांदी के बर्तनों व पत्तों की पत्तल में भी भोजन कराना अच्छा माना गया है।

 

???? आप गाय को गुड, हरा चारा, गेहूं का दलिया आदि खिलाकर भी पितरों का श्राद्ध संपन्न कर सकते हैं अर्थात श्राद्ध के दिन गाय को यह सब खिलाने से भी श्राद्ध का कार्य संपन्न हो जाता है।।

 

????पितरों के मुक्ति के लिए श्राद्ध के दिनों में गीता के पाठ करें। संपूर्ण गीता पाठ संभव न हो सके तो कम से कम गीता का सातवां अध्याय जरूर करें।

 

????श्राद्ध पक्ष में पितरों के प्रति श्रद्धा भाव से यदि आप श्राद्ध संपन्न करते हैं, तो निश्चित रूप से आपकी कुंडली में मौजूद पितृ दोष का प्रभाव कम हो जाता है।

 

???? यदि आपको किसी तरह की तर्पण व श्राद्ध विधि इत्यादि नहीं आती है। तो भी आप इस मंत्र से तर्पण व श्राद्ध कार्य कर सकते हैं। सुबह स्नान के बाद 108 बार इस मंत्र का जाप श्रद्धा पूर्वक करते हुए अपने पितरों को नमस्कार कर सकते हैं। गीता का सातवां अध्याय पढ़ सकते हैं।

 

      ||ॐ पितृ देवतायै नम:||

 

गया तीर्थ की कथा

   

      ब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे उस दौरान उनसे असुर कुल में गया नामक असुर की रचना हो गई। गया असुरों के संतान रूप में पैदा नहीं हुआ था इसलिए उसमें आसुरी प्रवृति नहीं थी. वह देवताओं का सम्मान और आराधना करता था।

 

उसके मन में एक खटका था. वह सोचा करता था कि भले ही वह संत प्रवृति का है लेकिन असुर कुल में पैदा होने के कारण उसे कभी सम्मान नहीं मिलेगा. इसलिए क्यों न अच्छे कर्म से इतना पुण्य अर्जित किया जाए ताकि उसे स्वर्ग मिले।

 

गयासुर ने कठोर तप से भगवान श्री विष्णुजी को प्रसन्न किया. भगवान ने वरदान मांगने को कहा तो गयासुर ने मांगा- आप मेरे शरीर में वास करें. जो मुझे देखे उसके सारे पाप नष्ट हो जाएं. वह जीव पुण्यात्मा हो जाए और उसे स्वर्ग में स्थान मिले।

 

भगवान से वरदान पाकर गयासुर घूम-घूमकर लोगों के पाप दूर करने लगा. जो भी उसे देख लेता उसके पाप नष्ट हो जाते और स्वर्ग का अधिकारी हो जाता।

 

इससे यमराज की व्यवस्था गड़बड़ा गई. कोई घोर पापी भी कभी गयासुर के दर्शन कर लेता तो उसके पाप नष्ट हो जाते. यमराज उसे नर्क भेजने की तैयारी करते तो वह गयासुर के दर्शन के प्रभाव से स्वर्ग मांगने लगता. यमराज को हिसाब रखने में संकट हो गया था।

 

यमराज ने ब्रह्माजी से कहा कि अगर गयासुर को न रोका गया तो आपका वह विधान समाप्त हो जाएगा जिसमें आपने सभी को उसके कर्म के अनुसार फल भोगने की व्यवस्था दी