History
*सरुण्ड माता* मामौड़िया, अटोलीया, कुलवाल, जंघिनिया, बड़गोती और हल्दीया गोत्रों की कुलदेवी Share on
मुख्य गोत्र: यह मंदिर खंडेलवाल वैश्य समाज के मामौड़िया, अटोलीया, कुलवाल, जंघिनिया, बड़गोती और हल्दीया गोत्रों की कुलदेवी हैं।
मेला और आयोजन: प्रतिवर्ष चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहाँ पर विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें राजस्थान समेत देश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु माँ के दर्शन के लिए आते हैं।
सीढ़ियाँ: मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को लगभग 284 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, जो इसे एक श्रद्धापूर्ण यात्रा बनाती है।
द्वारा अभिषेक कुलवाल 9773398549
खंडेलवाल समाज की उत्पत्ति और गोत्रों का इतिहास
जैसा कि आशीष खण्डेलवाल मो 9827611986
मेरे दादियाससुर स्व. श्री हरिकिशन जी भगत (ठकुरिया गोत्र, भगत हलवाई वाले, शिकोहाबाद) बताया करते थे कि पहले हमारे 84 गोत्र हुआ करते थे।
बाद में जब 12 गोत्रों की कन्याओं का विवाह क्षत्रिय ठाकुर राजा से हुआ, तब से हम खंडेलवाल सनातनी वैष्णव केवल 72 गोत्र के रह गए।
जिन खंडेलवालों ने आरंभ में, जब हम सब खंडेलवाल बने थे, जैन धर्म अपनाया, वे आज भी पूर्ण 84 गोत्रों के रूप में ही विद्यमान हैं।--
जिन खंडेलवालों ने यज्ञ, हवन और पूजा-पाठ को अपनाया, वे खंडेलवाल ब्राह्मण कहलाए।
वे हमारे खंडेलवाल वैश्य (बनियों) के जोशी हुआ करते थे, और हम उनके यजमान।
वहीं जिन खंडेलवालों ने व्यापार या व्यवसाय अपनाया, वे खंडेलवाल वैश्य (बनिए) कहलाए।
द्वारा अर्पित गुप्ता उज्जैन
आपकी इस जानकारी को इंटरनेट पर भी सर्च किया
जानकारी मिल रही है
की माता का मूल स्वरूप
*चिलाय माता है*
चूंकि यह राजस्थान के सरुण्ड गाँव में विराजमान हैं, वर्षों से सरुण्ड गांव की देवी के रूप में प्रख्यात होने से *सरुण्ड माता* के नाम से विख्यात हुई ।
इसके अलावा चिलाय माता को मनसा देवी एवं योग माया माता के नाम से भी जाना जाता है।
पर केवल इंटरनेट की जानकारी पर्याप्त नहीं हैं।
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हमारे पूर्वज कुल्लू (मनाली) घाटी के सूर्यवंशी क्षत्रिय थे, इसलिए हमारा गोत्र कूलवाल पड़ा —
क्योंकि हम कुल्लू घाटी से संबंधित थे।
जिन खंडेलवालों ने तांबे का व्यापार किया, उनका गोत्र तांबी पड़ा।
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???? *क्या सच में माँ बदली जा सकती है*?????
(*कुलदेवी—मातृत्व की अमर ज्योति*)
*अपने परिवार,बच्चो और बड़ो को माँ कुलदेवी का महत्व बताये उन्हें ग्रुप से जोड़े*
*माँ…वो शब्द नहीं, एक अनुभूति है*।
*मातृभूमि, जननी और कुलदेवी* — ये तीनों जीवन की वह त्रिवेणी हैं,
जहाँ भाव, भक्ति और बलिदान एक साथ प्रवाहित होते हैं।
मातृभूमि का ऋण कोई चुका नहीं सकता,
जननी का स्थान कोई ले नहीं सकता,
और कुलदेवी का आशीर्वाद ही हमारे संस्कारों की रक्षा करता है।
*हर माता और हर संतान के बीच एक अदृश्य डोर होती है* —
समर्पण की, स्नेह की, और आस्था की।
पर सोचिए…
*क्या वह माँ, जिसने अपनी कोख से हमें जन्म दिया,उसका स्थान कोई और ले सकता है* ?
यदि नहीं —
तो फिर *हमारी कुलदेवी*, जो हमारे गोत्र, परिवार और जो हमारे कुल की रक्षा करती हैं,
उनका स्थान भी कोई और कैसे ले सकता है?
*आज विभिन्न समाज में यह सोचने का समय है कि*
जब संतान का जडूला उतारने का अवसर आता है,
तो हम माता के मूल स्थान पर ही क्यों जाते है और जो अन्यत्र विकल्प ढूंढ लेते है सोचे माता कही दुखी या रुष्ट तो नहीं हो गई।
*हमने अपने घर के मंदिर में, या किसी अन्य जगह माता की मूर्ति के समक्ष,
स्नेह और श्रद्धा से यह संस्कार नहीं करना चाहिए।
*आज के युग में कई लोग “शॉर्टकट” में अपने कर्तव्यों को पूरा कर लेते हैं*,
और सोचते हैं कि माता प्रसन्न हो जाएँगी।
पर क्या यह भावनात्मक और धार्मिक रूप से उचित है?
*माँ तो अपने बच्चे की रक्षा प्राण देकर भी करती है*,
वैसा ही भाव, वैसी ही करुणा, हमारी कुलदेवी के मूल स्थान में भी विद्यमान है।
हमारे उज्जैन शहर में प्रतिदिन हजारों युवक-युवतियाँ
पितृ दोष, सर्प दोष, नारायण बली या मंगल दोष के निवारण हेतु आते हैं।
पर क्या हमने सोचा कि ये दोष क्यों आते हैं?
क्योंकि हमने कहीं न कहीं अपने मूल संस्कारों, परंपराओं और देवी आस्था से दूरी बनाई है।
और जब हम अपने मूल से दूर होते हैं, तो बाधाएँ स्वाभाविक हैं।
आज कई बंधु अहंकार, मतभेद या स्वार्थ के कारण
माता के नए-नए स्थान बना रहे हैं।
वे पूजनीय अवश्य हैं, पर याद रखिए —
मूल स्थान, मूल ही होता है।
यदि किसी स्थान पर गोत्र बंधुओं में विवाद या कब्जे की समस्या हो,
तो उसका समाधान खोजिए, विकल्प नहीं।
क्योंकि जिस प्रकार कोई जननी नहीं बदली जा सकती,
वैसे ही कुलदेवी और उनका स्थान भी नहीं बदला जा सकता।
हमारी कोशिश एकता की हो,
हमारा उद्देश्य समाज और संस्कारों की रक्षा का हो।
हमारे कदम उस दिशा में बढ़ें जहाँ
हम अपने बच्चों को आस्था, परंपरा और मातृत्व का वास्तविक अर्थ सिखा सकें।
याद रखिए —
*माँ को मत बदलो, मार्ग बदलो*।
*आस्था को मत बाँटो, एकता को जगाओ*।
कुलदेवी केवल एक देवी नहीं —
*वह हमारे कुल की संरक्षिका, संचालिका और संस्कारों की ज्योति हैं*।
उनके चरणों में ही हमारे जीवन की शांति, सुरक्षा और शक्ति निहित है।
*माँ तो बस माँ ही होती है*…
और *कुलदेवी — उस माँ का ही अनंत रूप*।
– *डॉ. अशोक खंडेलवाल*
चिकित्सा संसार
*खंडेलवाल तकनीकी विकास समिति*
9399008071,9425092492
