History

जमवारामगढ़ क्षेत्र में दाँत माता (नन्द भगोती माता) : ऐतिहासिक, सामाजिक एवं परंपरागत अध्ययन Share on

 

1. भूमिका

राजस्थान का जमवारामगढ़ क्षेत्र प्राचीन काल से ही शक्ति‑उपासना, लोकदेवियों और कुलदेवी परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ निवास करने वाले विभिन्न समाजों—विशेषकर मीणा समाज तथा खंडेलवाल वैश्य समाज—में देवी आराधना की परंपरा पीढ़ी‑दर‑पीढ़ी चली आ रही है। इसी परंपरा में दाँत माता का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिन्हें किलकिलिया गोत्र द्वारा नन्द भगोती माता के रूप में भी स्वीकार किया जाता है।

यह लेख पूर्णतः जमवारामगढ़ क्षेत्र पर केंद्रित है और दाँत माता की मान्यता, उनके स्थान, स्थानीय संत‑परंपरा तथा किलकिलिया गोत्र से उनके संबंध को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है।

2. जमवारामगढ़ क्षेत्र : धार्मिक पृष्ठभूमि

जमवारामगढ़ जयपुर जिले का एक ऐतिहासिक क्षेत्र है, जो अरावली पर्वतमाला से घिरा हुआ है। यह क्षेत्र प्राचीन काल से तपोभूमि, आश्रम संस्कृति और लोकदेवी‑देवताओं की आराधना के लिए जाना जाता रहा है।

यहाँ की धार्मिक विशेषताएँ—

पहाड़ियों, जंगलों और जलस्रोतों के समीप देवी‑स्थलों की स्थापना

स्थानीय समाजों द्वारा देवी को रक्षक शक्ति के रूप में स्वीकार करना

मौखिक परंपरा, साधु‑संतों और जागा‑परंपरा के माध्यम से इतिहास का संरक्षण

इसी पृष्ठभूमि में दाँत माता का प्राकट्य और उनका पूजन विकसित हुआ।

3. दाँत माता धाम : स्थान एवं मान्यता

जमवारामगढ़ क्षेत्र में स्थित दाँत माता धाम एक प्राचीन शक्ति‑स्थल के रूप में मान्य है। यह स्थान केवल मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, तप और परंपरा का केंद्र रहा है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार—

देवी का प्राकट्य दिव्य संकेत/आकाशवाणी के माध्यम से हुआ।

इस स्थान को प्रारंभ में स्थानीय लोगों ने संरक्षित किया।

कालांतर में यहाँ देवी की विधिवत स्थापना हुई और पूजन प्रारंभ हुआ।

दाँत माता को यहाँ शक्ति, संरक्षण और वंश‑रक्षा की देवी के रूप में पूजा जाता है।

4. आश्रम परंपरा और सूरदास जी महाराज

दाँत माता धाम के नीचे स्थित आश्रम में सूरदास जी महाराज का निवास रहा, जो अपने समय के वयोवृद्ध, अनुभवी और परंपरागत ज्ञान के धारक थे।

स्थानीय लोगों और समाज के वरिष्ठजनों के अनुसार—

सूरदास जी महाराज के पास देवी, गोत्र और समाज से संबंधित पुराने कागजात/पेपर सुरक्षित थे।

उनसे हुई चर्चाओं में यह स्पष्ट किया गया कि खंडेलवाल समाज के किलकिलिया गोत्र की कुलदेवी दाँत माता ही नन्द भगोती माता हैं

यह जानकारी किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि वर्षों की साधु‑परंपरा और सामाजिक स्मृति पर आधारित थी।

आश्रम परंपरा ने इस मान्यता को स्थायित्व प्रदान किया।

5. किलकिलिया गोत्र और दाँत माता

खंडेलवाल वैश्य समाज के किलकिलिया गोत्र में नन्द भगोती माता को कुलदेवी माना जाता है। जमवारामगढ़ क्षेत्र से जुड़ी परंपरा में यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया कि—

दाँत माता = नन्द भगोती माता

नाम भिन्न हो सकता है, पर देवी‑तत्व एक ही है।

समय और स्थान के अनुसार देवी के नाम में परिवर्तन स्वाभाविक है, किंतु आस्था निरंतर बनी रहती है।

इसी मान्यता के आधार पर—

पीलवा, पाल एवं पदमपुरा (दौसा, राजस्थान) के किलकिलिया परिवार

दाँत माता को ही नन्द भगोती माता के रूप में पूजते हैं।

6. मीणा समाज और दाँत माता

जमवारामगढ़ क्षेत्र में मीणा समाज की प्राचीन उपस्थिति रही है। मीणा समाज दाँत माता को अपनी आराध्य देवी मानता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण सामाजिक समन्वय दिखाई देता है—

मीणा समाज की दाँत माता

खंडेलवाल किलकिलिया गोत्र की नन्द भगोती माता

दोनों को एक ही देवी‑स्वरूप माना जाता है। यह दर्शाता है कि स्थानीय देवी‑परंपराएँ समाजों के बीच सेतु का कार्य करती हैं।8. निष्कर्ष

जमवारामगढ़ आधारित अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि—

दाँत माता धाम एक प्राचीन शक्ति‑स्थल है।

आश्रम परंपरा और सूरदास जी महाराज के कथनों से यह प्रमाणित होता है कि किलकिलिया गोत्र की नन्द भगोती माता ही दाँत माता हैं।

मीणा समाज और खंडेलवाल समाज की देवी परंपरा यहाँ एक‑दूसरे में समाहित होती है।

पीलवा, पाल और पदमपुरा के किलकिलिया परिवारों द्वारा दाँत माता की पूजा इस मान्यता की जीवंत पुष्टि है।

इस प्रकार, जमवारामगढ़ क्षेत्र में दाँत माता = नन्द भगोती माता केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि परंपरा, आश्रम‑ज्ञान और सामाजिक स्वीकार्यता से स्थापित एक सशक्त ऐतिहासिक मान्यता है।