History

ओरल माता कुलदेवी रावत गोत्र Share on


रावत मतलब राजा का परिवार,उनसे जुड़े लोग रावत कहलाए।
ओरल माता के चमत्कार भी विभिन्न सपनो और प्रेरणा से जुड़े है।(देखे वीडियो)आज से 40 साल पहले बहुत कम श्रद्धालु पहुंचते थे।जैसे जैसे जागृति और प्रेरणा हुई मंदिर का विकास हुआ।श्री  जुगल जी रावत विशाखापट्टनम वालो ने अग्रज बनकर इस स्थल को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ओरल माता मंदिर राजस्थान के जयपुर जिले में अरावली पर्वत श्रृंखला के अंतर्गत स्थित एक प्राचीन शक्ति-उपासना स्थल है। यह मंदिर क्षेत्रीय समाज, विशेषतः खंडेलवाल वैश्य समाज की रावत गोत्र की  कुलदेवी परंपरा से जुड़ा हुआ  है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ओरल माता देवी दुर्गा का ही एक स्वरूप हैं। “ओरल” शब्द को देवी की आज्ञा या वाणी के अर्थ में लिया जाता है। मान्यता है कि जब इस क्षेत्र में सामाजिक असुरक्षा और अव्यवस्था बढ़ी, तब माता की उपासना द्वारा धर्म और समाज की रक्षा की गई।
ऐतिहासिक दृष्टि से अरावली क्षेत्र में देवी-उपासना के अनेक प्राचीन केंद्र रहे हैं। राजपूत एवं वैश्य समाज युद्ध, आपदा एवं संकट के समय कुलदेवी की शरण लेते थे। ओरल माता मंदिर भी इसी परंपरा का हिस्सा रहा है, जहाँ समाज सामूहिक रूप से पूजा, ध्वजा और जोत अर्पित करता रहा।
खंडेलवाल वैश्य समाज रावत गोत्र की विवाह, संतान, व्यापार तथा नवीन कार्य आरंभ करने से पूर्व माता का स्मरण करने की परंपरा आज भी प्रचलित है। यह आस्था समाज को संस्कार, अनुशासन और एकता से जोड़ती है।
मंदिर का प्रारंभिक स्वरूप साधारण शक्ति-स्थल रहा होगा, जिसे समय के साथ समाज के सहयोग से विकसित किया गया। वर्तमान में मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक मिलन और सांस्कृतिक स्मृति का केंद्र बन चुका है।
यहां अब मंदिर , रसोई घर, आवास हेतु कमरे, मंदिर स्थल का प्रवेश द्वार, सीढ़ियां आदि सभी विकसित की जा चुकी है।

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