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मेरे जीवन की यात्रा एक जीवन, एक पीढ़ी, एक सेवा-दर्शन Share on

 

डॉक्टर अशोक खंडेलवाल की आत्मकथात्मक गाथा)

4 सत्र शिक्षा,मेडिकल,चिकित्सा संसार,सामाजिक सेवाएं

अध्याय 1 : बचपन, परिवार और निर्भीक जीवन दृष्टि

छह भाई-बहनों वाले परिवार में जन्म लेना अपने आप में एक सामूहिक सुरक्षा-कवच था। जीवन में जोखिम, चोट, असफलता या मृत्यु तक का भय कभी मन में घर नहीं कर पाया। हम मानते थे—एक नहीं तो पाँच तो हैं ही। यही सोच हमें निर्भीक बनाती गई। माता-पिता भी उतनी चिंता नहीं करते थे जितनी आज एक-दो बच्चों के माता-पिता करते हैं।

साइकिल से गिरकर लगी चोटें, कबड्डी के खेल में आई खरोंचें, मोटरसाइकिल और स्कूटर के एक्सीडेंट—सब कुछ जीवन का सामान्य हिस्सा था। माता-पिता को बताने का अवसर ही नहीं मिलता था। 1976 में पूरा इंदौर साइकिल से नाप लेना, पैदल और साइकिल से लंबी यात्राएँ करना—यह सब उस समय सामान्य था।

आज छोटी-सी चोट अस्पताल ले जाती है, तब चोटें जीवन का शिक्षक थीं।

अध्याय 2 : सपने, संघर्ष और आत्मनिर्भरता की यात्रा

सपनों की यात्रा साइकिल से शुरू होकर बाइक और फिर कार तक कब पहुँची—पता ही नहीं चला। 1990 तक यह सफर सहज हो गया। मक्सी से बड़वानी, सोयत, सुसनेर, डोंगरगाँव—लगभग 200 किलोमीटर की यात्राएँ बाइक से बिना किसी भय के होती रहीं।

व्यवसाय और संपत्ति का प्रबंधन भी इसी आत्मविश्वास से हुआ। मक्सी में तीन शॉप का प्रबंधन अकेले कर लेना, बीमा अभिकर्ता के रूप में 27 वर्ष पूर्व करोड़पति बन जाना—सब सेवा और श्रम का प्रतिफल था।

1983 में बिना रिश्वत, केवल योग्यता और सशक्त साक्षात्कार से झाबुआ पोस्टिंग के साथ शासकीय नौकरी मिली। पर पिता के एक प्रश्न ने जीवन की दिशा तय कर दी—"घर या नौकरी?" घर और जिम्मेदारी को चुनना ही जीवन का निर्णायक मोड़ बन गया।

अध्याय 3 : चिकित्सा संसार, नेतृत्व और राष्ट्रव्यापी सक्रियता

मेडिकल प्रोफेशन में रहते हुए देशभर में एसोसिएशन नेतृत्व का दायित्व मिला। दिल्ली के जंतर-मंतर का आंदोलन, गुलाम नबी आज़ाद और शरद पवार जैसे मंत्रियों से संवाद, दिल्ली की प्रेस पब्लिसिटी और करोलबाग में 1000 केमिस्टों की व्यवस्था—सब स्मृतियों में अंकित है।

उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल—हर क्षेत्र में बड़ी बैठकों का नेतृत्व किया। आयुर्वेद, एलोपैथी और नैचुरोपैथी—तीनों चिकित्सा पद्धतियों में देश-विदेश तक सेवा का अवसर मिला। नेपाल नरेश के साथ दिल्ली के ताज होटल में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से वन-टू-वन संवाद, आयुष मंत्रालय में निरंतर बैठकें—यह सब चिकित्सा संसार की पहचान बनी।

सैकड़ों निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर, सर्जरी कैंप, 1983 में एक केमिस्ट फार्मासिस्ट के साथ साथ  आयुर्वेद चिकित्सक  के रूप गाँवों में 10 पैसे, चार आने या एक रुपये में इलाज—यह सेवा का युग था, 24 घंटे सेवा का प्रकल्प रात में भी ग्रामीणों की आकस्मिक बीमारियों का समाधान एलोपैथिक द्वारा। आज जहाँ कानूनों का जाल है, तब संवेदना का राज था।

अध्याय 4 : सेवा, समाज और जीवन का निष्कर्ष

सेवा का नियम स्पष्ट है—जब आप दूसरों के लिए कार्य करते हैं, तो ईश्वर आपके लिए मार्ग बनाता है। लाखों-करोड़ों के कार्य कैसे पूर्ण हुए, इसका हिसाब कभी नहीं रखा। उज्जैन का समय आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण था—20 हजार प्रतिमाह कमाना कठिन था, आपात निधि नहीं थी, फिर भी कार्यशालाएँ, आयोजन और कार्यक्रम स्वतः होते रहे।

45 से अधिक पुस्तकों का लेखन—स्वास्थ्य, योग, समाज, लायंस क्लब, व्यापारी संघ, राजनीति, डायबिटीज—कोई विषय अछूता नहीं रहा। राजनीति से दूरी रखी, पर संबंध मधुर बने रहे।

अब ठाकुर जी की अध्यक्षता में खंडेलवाल समाज की सेवा का संकल्प जीवन का वर्तमान अध्याय है। मेरा विश्वास है—यदि हम स्वयं में सुधार लाएँ, समाज स्वतः सुधरेगा।

65 वर्ष कब बीत गए, पता ही नहीं चला। यह जीवन एक व्यक्ति की नहीं, एक पूरी पीढ़ी की कथा है।

उपसंहार : अनुभव से संदेश

जीवन की यह यात्रा—छोटे गाँव से लेकर देश-विदेश की चिकित्सा सेवा, संघर्ष से लेकर नेतृत्व तक—मुझे यह सिखाती है कि सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों में नहीं, बल्कि सेवा और संस्कार में है।

हमारे जीवन के संघर्ष, चोटें, कठिनाइयाँ और निर्णय केवल अनुभव नहीं थे; उन्होंने मुझे आकार दिया, सोच दी और दूसरों की सेवा करने की प्रेरणा दी। चिकित्सा संसार केवल संस्था नहीं, एक विचारधारा बन गया—जहाँ सेवा, भरोसा और मानवता सर्वोपरि हैं।

मेरा यह विश्वास है कि जब व्यक्ति स्वयं को सुधारता है, अपने ज्ञान, अनुभव और संसाधनों को समाज के लिए समर्पित करता है, तो समाज स्वतः विकसित होता है। यही जीवन का सबसे बड़ा संदेश है—कर्तव्य, निस्वार्थ सेवा और सतत प्रयास।

आज, 65 वर्षों के जीवन के बाद, जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो हर कठिनाई, हर संघर्ष, हर यात्रा, हर सफलता और हर असफलता इस उपसंहार को पूर्ण बनाती है। 

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