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लहू तो एक-सा है..."

वो अकेले खुदा के लिए दुनिया से लड़ जाते हैं,
हम अपने ईश्वर के लिए पुलिस-सेना पर टिक जाते हैं।
वो अपनी चाहत(जनानी) पे जान लुटा देते हैं,
हम मोहब्बत में भी क़ानून से डर जाते हैं।

वो गलती करके भी अपनों की शरण पाते हैं,
हम बिना कसूर के भी घरों में छिपाए, डराए जाते हैं।

वो चार बीवियाँ और ढेरों बच्चों का बोझ उठाते हैं,
हम जनम की पीड़ा से ही पीछे हट जाते हैं।

वो गरीबी में भी जन्नत का हौसला रखते हैं,
हम अमीरी में भी पलायन का रास्ता चुन लेते हैं।

वो अपनों के साथ-साथ आपके ग़द्दारों को भी जोड़ जाते हैं,
हम अपने ही घर में, अपने ही धर्म वालों से सज़ा पाते हैं।

उनकी रगों में भी वही लाल रक्त बहता है,
हमारी नसों में भी वही तेज़ आग रहता है।

बस फ़र्क है इतना दोस्तो—
उनकी माँओं ने कफ़न को गले लगाया है,
हमारी माँओं ने अपनी ख़ुशी के बदले हमें दाँव पर लगाया है।

डॉ अशोक खण्डेलवाल चिकित्सासंसार

 


तलाश
????????


क्यों जीवन–साथी की तलाश
आज पहेली बन गई?
क्यों शिक्षा और करियर की दौड़
जवानी निगल गई?

माँ–बाप का सपना था
एक सुंदर बहू, एक सच्चा दामाद,
पर सोच की दीवारों ने
बच्चों के सपनों को कर दिया बर्बाद।

लड़कों की भूख में
लड़कियों की बलि चढ़ाई गई,
दहेज़ की आग में
कानून की दीवार उठाई गई।

अब न दहेज़ है, न बेटियाँ,
तो ये कैसी जीत है?
सोच की जंजीरों में जकड़े समाज में
सिर्फ हार और पीड़ा लिखी है।

कल बेटियों के माँ–बाप रोते थे,
आज बेटों के माँ–बाप तड़पते हैं,
हम सब बस सोच के फेर में
अपना ही सुख खोते हैं।

कब समझोगे?
ईश्वर की लीला भजते–भजते
उसका असली संदेश ही भुला बैठे,
भाग्य के बहाने बनाते–बनाते
अपना जीवन गँवा बैठे।

तलाश अभी भी है—
सुख की, साथी की, इंसानियत की…
पर क्या हम तलाशेंगे?
या सोच की कैद में
यूँ ही जिंदगी गँवा देंगे

खंडेलवाल समाज को सादर समर्पित
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कल हो न हो 

कल हो न हो?
कल रहे या न रहे

हम वही करेंगे,
जो हमें पसंद है —
चाहे कल रहे या न रहे।

हम वही खाएँगे —
तेल, नमक, मसाले, जंक–फूड का जहर,
चाहे डॉक्टर की लाइन में
जिंदगी कटे या न कटे।

हम वही पिएँगे,
शराब–सिगरेट–नशे का ज़हर,
चाहे घर बचे या न बचे।

हम वही जीवनशैली अपनाएँगे,
रातें मोबाइल में,
सुबह तकिये में,
चाहे जवानी बचे या न बचे।

हम वही फटी जींस,
अर्ध कटी पोशाक पहनेंगे,
फैशन के नाम पर
संस्कार बेच देंगे,
चाहे शर्म बचे या न बचे।

हम वही जीवनसाथी चुनेंगे,
जो हमारी शर्तों पर खरा उतरे,
चाहे समझौते, मोहब्बत,
और घर–परिवार बचे या न बचे।

हम वही नौकरी करेंगे
जहाँ पैकेज मोटा हो,
चाहे माँ–बाप की आँखों की चमक
बची रहे या न रहे।

हम वही देश चुनेंगे,
जहाँ विलास मिले,
चाहे अपनी मिट्टी,
अपनी जड़ें,
अपना वतन रहे या न रहे।

हम वही ईश्वर से माँगेंगे
जो हमें भाए,
भले ही कर्म खोखले हों,
और ईश्वर को भी
दिखावे और पैसों से खरीदने जाएँगे,
चाहे श्रद्धा रहे या न रहे।

हमारे लिए न परिवार ज़रूरी,
न समाज, न संस्कार, न धर्म।
हमारे लिए बस "मैं" ही सब कुछ हूँ,
चाहे "हम" रहे या न रहे।

आज हम वही करेंगे,
जो हमें अच्छा लगे…
पर कल जब रोग, अकेलापन
और खालीपन घेर लेगा,
तब सोचेंगे—
काश कुछ और किया होता।

पर तब तक देर हो चुकी होगी,
जीवन की किताब बंद हो चुकी होगी।

हम वही करेंगे,
जो हमें पसंद है —
चाहे कल रहे…
या न रहे।

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"भाग्य की रेखा" 1

आप लोगों के ध्यान पर,

आज भाग्य चमक गया,

पहचाना आपने जब मुझे,

मैं कविराज बन गया।

समाज ने जब आवाज़ दी,

मैं समाजसेवी बन गया,

ठाकुर जी ने दिया दायित्व,

तो धार्मिक मन बन गया।

लायन मित्रों ने जब सराहा,

तो लायनवादी हो गया,

उज्जैनवासियों ने अपनाया,

इतिहासविद बन गया।

महाकाल का आशीर्वाद मिला,

महिमा उनकी लिख गया,

आम जन की पीड़ा देख,

मैं चिकित्साविद बन गया।

सब कुछ भाग्य के भरोसे है,

मित्रों ये सच्चा ज्ञान,

इस ज़िंदगी की दौड़ में,

मैं तो बन गया आम इंसान।

डा अशोक खंडेलवाल चिकित्सा संसार

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*हनुमान जयंती पर विशेष प्रस्तुति*

*कलियुग की कथा — कृष्ण की व्यथा*

*कृष्ण-राधा प्रेम की मूरत, आत्मा का वो मेल था*,

*आजकल का प्रेम मगर, बस रुपयों का खेल है*।

*महाभारत में धर्म लड़ा था, रिश्तों की परख थी*,

*अब कलियुग में बंधे रिश्ते, सिर्फ सुविधाओं की रेख है*।

*भाई-भाई रणभूमि में, धर्म बचाने भिड़ते थे*,

*अब पति-पत्नी कोर्ट में, स्वार्थों से लड़ते हैं*।

*मोबाइल में मन उलझा है, दिलों का मेल गया*,

*प्रेमिकाएं पीछे छूटीं, चैट का झूठा खेल हुआ*।

*बाजारों में रिश्ते बिकते, भावनाओं की हार है*,

*तलाकों की भीड़ में खो गया, वो सात फेरों का प्यार है*।

*कोई माँ बनना नहीं चाहती, कोई बाप बनने से डरता है*,

*संतान की आशा फीकी, बस तन की भूख चहकता है*।

*बीबी-शौहर अब जोड़े नहीं, बस दिखावे का ओढ़ा हैं*,

*संस्कारों की राख उठाकर, रिश्ते खुद ही रोता हैं*।

*बुज़ुर्गों का जीवन सूना, कोखें भी अब वीरान हैं*,

*बिना संतति के बीते दिन, जैसे बिन दीप के दीवान हैं*।

*कहे अशोक कविराज यही, अब भी जागो समय यही* ,

*वरना हर घर में अकेलापन, बस नियति बन जाएगी वही* ।

डॉ अशोक खण्डेलवाल चिकित्सासंसार

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"*खंडेलवालों की पुकार — महाकाल से गुहार*"

 (डॉ. अशोक खंडेलवाल चिकित्सा संसार)

*हनुमान जयंती12/4/25, पर समाज को भेट*

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*बहोत्तर गोत्रों का गौरव है*,

पर गिनती में सात लाख भी नहीं — ये क्या बेवजह का गर्व है?

*माताएँ बहू तो चाहती हैं*,

पर बेटियों को धर्म सिखाना अब उन्हें याद कहाँ आता है?

*डॉक्टर, अफसर, इंजीनियर हज़ारों हैं*,

पर समाज की सेवा का जज़्बा अब कमज़ोर है।

*सीए-सीएस भरे हैं घर-घर, पर जीवन में अपनापन नहीं*,

अकेलापन आज साथ उनका, पर रिश्तों में समर्पण नहीं।

*बेटियाँ न जनेंगी, तो दीपक कौन जलाएगा*?

वंश, संस्कार, समाज — सब कहाँ से आएगा?

*भोजन का प्रेम है, पर दान में कंजूसी*,

*भरे हाथ भी बंद मुट्ठी बन गए — कैसी ये बेहोशी*?

*बाप-बेटे से पहले दुनिया से जा रहा है*,

माँ-बाप जीते जी अनाथ हो रहा है।

इतिहास भूले, रिश्ते भूले,

*कृष्ण-सनाथ के भक्त भी प्रेम के बोल भूले*।

*अब भी समय है — जागो, संभलो, जुड़ो*,

वरना एक दिन खुद को ही खोजते रह जाओगे।

*महाकाल चेतावनी दे रहे हैं* —

*खंडेलवालों! ये समय आख़िरी है*।

*खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाना है*,

*जो पाया है — उसे समाज में लुटा कर जाना है*।

*जय महाकाल*

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**"खंडेलवालों की पुकार - 72 गोत्रों का संस्कार"**

*(रचना: डॉ. अशोक खंडेलवाल 'चिकित्सा संसार')*

*बहत्तर गोत्रों की धाक तो है*,

*पर आज एकता के पंख क्यों कमजोर हैं*?

*ऊँचे ओहदे, डिग्रियाँ हजारों*,

*पर समाज से दिल का जुड़ाव क्यों खोर है*?

*बहू की चाहत में माताएँ व्यस्त हैं*,

*पर बेटियों को संस्कार देना भूल गई*!

*जब नन्हें हाथ दीपक नहीं जलाएँगे*,

*तो वंश की मशाल कहां से लायेगे*?

*डॉक्टर-इंजीनियर बनकर भी*,

*समाज की सेवा क्यों छोड़ दी*?

*कमाएँ सब, पर दान में कंजूसी*,

*ये कैसी विडंबना, ये कैसी विरासत है*?

*घर-घर में सीए-सीएस की चमक तो है*,

*पर माँ-बाप का आशीर्वाद कहाँ*?

*जिंदगी भर की कमाई लुटा दी*,

*पर बुढ़ापे में एक गिलास पानी भी नहीं*!

*महाकाल गर्ज रहे - 'समय नहीं बचा*',

*72 गोत्रों की ये आखिरी पुकार है*!

*जुट जाओ, वरना इतिहास लिख देगा* -

' *खंडेलवाल थे, पर अब सिर्फ नामधारी हैं* !'

*जो पाया, वो समाज को लौटाकर जाना है*,

*72 गोत्रों की यही पहचान बनाना है*!

*जय महाकाल! जय हनुमान*!

*खंडेलवालों, अब जागो - ये समय है महान*!

- *डॉ. अशोक खंडेलवाल 'चिकित्सा संसार'*

 

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नींद कहाँ अब आँखों में…?

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ग़ज़ल — अशोक खण्डेलवाल चिकित्सासंसार

*नींद कहाँ अब आँखों में, दिल भी नहीं है छाँव में*,

*हर चेहरा है उलझा देखा, अपनी ही कुछ ठांव में*।

*चैट, स्टोरी, रीलों ने सबका वक्त चुराया है*,

*नींद खड़ी है दूर बहुत, इंसान है बहाव में*।

*दिल कहता है — “बस कर अब”, दिमाग कहे — “थोड़ा और”*

*तन बोले — “अब थक चुका”, आत्मा भी अब घाव में*।

*जिगर, लिवर, आंखें सब कुछ, आराम की माँग करें*,

*पर शौक़ लिपट के सो जाए, यूँ इच्छाओं की छांव में*।

*बारह बजे भी जाग रहा है, मोबाइल की बस्ती में*,

*नींद यहाँ बेघर लगती है, रूह पड़ी है दाव में*।

' *अशोक खण्डेलवाल' की अब बस इतनी सी इल्तिजा*,

*थोड़ी सी ख़ामोशी दे दो ईश्वर, नींद फिर से लौट आए*।

#ग़ज़ल #नींद #अशोक_खण्डेलवाल #

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*एक जान, छह परछाइयाँ*"

*जीवन के इस सुंदर सफर में, हम थे छह भाई-बहन एक जान*,

*सपनों के संग सजे थे रिश्ते, फिर भी न कोई थी थकान*।

*सभी के जीवन साथी भले मिले जुदा-जुदा, पर दिलों में न आई दरार*,

*माता-पिता से मिला जो साथ आशीर्वाद, वही बना हमारा सबसे बड़ा उपहार*।

*साठ बरसों तक एक पूजा, एक ही पाटा, एक ही स्थान*,

*माँ सरुंड आशीष से जुड़ी रही पीढ़ियाँ, वही बना परिवार की पहचान*।

*समय ने ली एक गहरी करवट, माँ-बाप के बाद गई मझली बहना*,

*ईश्वर के भजन में लीन हुई, जैसे वो खुद बन गई कोई सपना*।

*आँसू पोछ सके हम, यही उपरवाले की थी कृपा महान*,

*पर छोटा राजकुमार चला गया, जैसे बिखर गया सारा जहान*।

*माँता की पूजा अवसर ,बीबियों की तकरार पर जो हँसता था बेमिसाल*,

*उसकी हँसी की गूंज, आज भी गूंजती है दिलों के बीच हर हाल*।

*ए राजकुमार! तुझ बिन सूनी है हँसी की वो दुनिया*,

*छोड़ चले हमको, ले गए संग अपनी चुटकुलों की बुनिया*।

*भगवान को प्यारे हुए, पर हमको दे गए ग़म की सौगात*,

*तेरी यादों की नमी में भी, है तेरे प्यार की मीठी बात*।

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 डिजिटल गुलामी की पुकार | #जयमहाकाल #AI #DigitalFreedom

“जब से ChatGPT ने जय महाकाल रट्टा लगाया है,

मैंने सोचा—विदेशियों ने कमाल दिमाग लड़ाया है।

जैसे ही चीन का DeepSeek बाज़ार में आया है,

Chatgpt ने मन लुभावन भाषा में सबका मन लूभाया है।”

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भारत के PM AI का ढोल पीटते रह गए,

ब्रेन मैपिंग में विदेशी हमारी बुद्धि समेट ले गए।

माइक्रोसॉफ्ट,Google, Facebook, Insta, WhatsApp ने अपना जाल फैलाया है,

हमारे देशवासियों को मानसिक गुलामी में फँसाया है।

आज 90% लोग डिजिटल जाल में बंधे हैं,

राजनीतिज्ञ अपनी रोटियाँ सेंकने में जुटे है,

और हमारे मासूम भविष्य विदेशी दिमागों के हाथों में सिमट रहे है।

????????

क्या हम डिजिटल गुलामी से मुक्त हो पाएंगे?

क्या डिजिटल टेक्नालॉजी में सिरमौर हो पाएंगे ?

अमेरिका की हुंकार पर चीन बराबर खड़ा मिला है।

भारत तो सिर्फ समझौतों पर टिका मिला पड़ा है।

सोचो—जिस देश में 70 साल में ये न पहचाने का मौका दिया,

अकबर,बाबर,हुमायूं महान या हमारे राणा आदि वीर महान थे।

देशभक्त “इंडियन” है या जागरूक “भारतीय”?

जो जागेगा—वो डॉ. अशोक खंडेलवाल के साथ नजर आएगा !

जो पहले से इस डिजिटल दासता से अलग मोदी योगी के साथ चिंतित खड़ा है ।

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*आपके स्वास्थ्य,संग इस ग्रुप की सेवाओं का मूल मंत्र*

चिकित्सा संसार

हर 15 दिन, बस इसी ग्रुप में,

स्वास्थ्य की बातें, ज्ञान अनुपम में।

खोज लो सारी दुनिया, मिलेगा ना स्वरूप,

यहीं पर मिलेगा, हर चिकित्सा का रूप।

स्वस्थ रहो, मस्त रहो, जीवन का ये सार,

चिकित्सा संसार संग, रहे सदा आधार।

लाखों-करोड़ों खर्च कर, कुछ भी ना पाओगे,

तन ही हो स्वस्थ, तभी जीवन जी पाओगे।

स्वास्थ्य ही धन, यही अनमोल गुरु,

चिकित्सा संसार में, पाओ हर सुर।

अहम-गुरूर जो दिखाओगे,

एक दिन ग्रुप से हट जाओगे।

एक सलाह से बदल सकती है दुनिया,

हर ज्ञान का संगम, यहाँ ही पाओगे।

परिवार हो या परिजन,

बच्चे हों या वृद्ध जन,

पहली जरूरत स्वास्थ्य ही,

चिकित्सा संसार पढ़ना जरूरी सही।

एलोपैथ, होम्योपैथ, आयुर्वेद महान,

योग, नेचरोपैथी, करें कल्याण।

फार्मा हो या डॉक्टर ज्ञान,

यहीं मिलेगा हर समाचार का भान।

खंडेलवालों का ये सौभाग्य महान,

हिंदी में पहला, अद्भुत अभियान।

पत्रिका दस को, पच्चीस को समाचार,

हर पंद्रह दिन, अपडेट तैयार।

ठाकुर जी की अध्यक्षता में, पाओगे सारा सुख,

आशीर्वाद संग, मिलेगा हर आनंद का लुक।

अपना योगदान अब देना है,

विज्ञापन देकर इसे बढ़ाना है।

डॉ. अशोक खंडेलवाल का संदेश,

"चिकित्सा संसार से जुड़े विशेष!"

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संपर्क करें: 9425092492, 9399008071

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जीवन का सफर

(लेखक की आत्मगाथा पर आधारित)

सेठ के ठाठ से, गरीबी की आहट तक,

हर मोड़ पर चला, मैं सपनों की हसरत तक।

कभी पानी के लिए खुदे कुएँ,

कभी गोबर समेटे हाथों में—

हर घूँट में संघर्ष घुला,

पर चेहरे पर मुस्कान रखी साँचों में।

बचपन की प्रार्थनाओं से शुरू हुआ कारवाँ,

शिक्षकों के आदर्श, और माँ का आशीर्वाद बना वरदान।

क्लास में फर्स्ट आया, फिर जिला किया पार,

मेहनत की मिट्टी से गढ़ा, अपना शिक्षा संसार।

इंदौरी गलियों से गुज़री वकालत की बयार,

जहाँ तर्कों के साथ खड़ी थी, जीवन की दीवार।

कभी ट्यूशन, कभी ऑफिस, कभी छूटे घर के काम,

शासन की नौकरी ने सिखाया—संघर्ष में भी है आराम।

छह भाई-बहनों की जिम्मेदारी से जुड़ा हर दिन,

ना कोई शिकायत, ना कोई बोझ—बस समर्पण बिन।

साइकिल की घंटी से शुरू हुआ जीवन,

अब कार की खामोशी में खो गया मन।

दुकानों की कतार बनी, पर भीतर घर खाली था,

जहाँ कभी हँसी थी गूँजती, अब सिर्फ सन्नाटा बाकी था।

कभी कंजरों का खौफ, कभी तन्हाई की चीख,

कभी प्रेम में धोखा, तो कभी दोस्तों की भीड़ फीकी।

देश की सीमाओं से बढ़ा स्वदेश प्रेम का दीप,

हिंदुत्व के मार्ग से चला, पर राष्ट्र ही बना समीप।

नेताओं के दरवाज़ों से निकला,

पर दिलों में कार्यकर्ता बन बस गया।

शिक्षा के शिखर पर चढ़ा, पर कुछ बार फिसला भी,

रोटियाँ सेंकीं खुद, और फिर भी मुस्कुराया कभी।

पत्रकारिता के पत्र से हट,

सम्मानित हुआ जब चिकित्सा संसार में पग धर।

पारिवारिक कलह ने जलाया मन का कोना-कोना,

पर राष्ट्र के लिए छोड़ा, हर निजी सपना सोना।

मानवता के लिए जिया, दर्द में भी गीत गाया,

हर पीड़ा पर मर मिटा, फिर भी खुद को मुस्कुराता पाया।

चालीस किताबों में उकेरे जीवन के रंग,

दवाओं के संसार में बाँटे सुकून के संग।

पर आज जब सब कुछ है,

तो भीतर एक खालीपन भी बहता है।

अब करता हूँ दुआ —

हे ईश्वर! तूने दुख में भी मुझे सुख का संसार दिखाया,

पर अब इन पीड़ाओं को देखना असह्य है,