खंडेलवाल समाज के महोत्सव रीति रिवाज - खंडेलवाल समाज के इतिहास में @सुधार कर हमें सुझाव दें - दा अशोक खंडेलवाल चिकित्सा जगत 9425092492 @विवाह-पूर्व धार्मिक एवं पारिवारिक संस्कार @गणेश पूजन @खंडेलवाल समाज में विवाह का शुभारम्भ भगवान गणेश के पूजन से किया जाता है। गणेशजी को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता माना गया है। विवाह की तिथि निश्चित के साथ परिवारजन शुभ गणेश में गणेश पूजन कर संपूर्ण विवाह उत्सव के निर्विघ्न मंत्र होने की प्रार्थना करते हैं। यह विवाह संस्कार का प्रथम धार्मिक संस्कार माना जाता है। @कुलदेवी एवं कुलदेवता पूजन @गणेश पूजन के बाद कुलदेवी एवं कुलदेवता का पूजन किया जाता है। खंडेलवाल समाज में कुल परंपरा और कुलदेवी श्रद्धा का विशेष महत्व है। विवाह जैसे मांगलिक अवसर पर परिवार अपने आराध्य देवी-देवताओं का स्मरण कर नवदम्पत्ति के सुख, समृद्धि और वंश वैभव की कामना करता है। @माता पूजन @विवाह से पूर्व माता पूजन की परंपरा भी कायम है। इसमें परिवार की महिला मंगलगीत गाती हुई माता स्थल पर पूजा करती हैं। यह रीटेल परिवार की मंगलकामना और देवी शक्ति के आशीर्वाद का प्रतीक है। @मण्डप स्थापना एवं गृह शुद्धि @विवाह के लिए मण्डप स्थापित किया जाता है। मंडप विवाह संस्कार का पवित्र केंद्र माना जाता है। इसके साथ गृह शुद्धि, कलश स्थापना और मांगलिक पूजन विधान भी शामिल हैं। @@विवाह पूर्व रसूमात लग्न @लग्न @विवाह प्रक्रिया का पहला महत्वपूर्ण चरण था। इस अवसर पर रिंग, मैनचेस्टर और सिक्कों की नियुक्ति की गई थी। दोनों के गोत्र एवं राजवंश का सार्वजनिक उल्लेख किया गया था और संबंध की सामाजिक घोषणा की गई थी। शैतान को बताओ और मर्दों को पान पिलाते थे। विवाह के साथ ही विवाह संबंध को सामाजिक आदान-प्रदान प्राप्त हो गया था। @टोका के @प्रतिनिधिमंडल के दोनों परिवारों के मध्य आत्मीय संबंध बनाए रखने के लिए समय-समय पर वस्त्र, मिठाई, नारियल या अन्य उपहार भेजे जाते थे। इस परंपरा को टोका कहा जाता था। इसका उद्देश्य सम्मिलन की सामुहिकता और वास्तुशिल्प निर्माण रखना था। @धौली सामूहिक @विवाह की तिथि निश्चित होने के बाद संबंधों और समाज को औपचारिक रूप से सूचित किया जाता था। इसे धौली ऑल्टरनेटिव प्लांट कहा जाता था। यह विवाह समारोह की सार्वजनिक घोषणा मानी गई थी। @मिलनो राम-रसोई @यह पारिवारिक मेल-मिलाप और सामूहिक आतिथ्य की परंपरा थी। इसके माध्यम से दोनों परिवार के संबंध और अधिक आत्मीय संबंध थे। @नटखट @विवाह का धार्मिक आधार था। शुभ उत्सव का होना निश्चित है। इसके साथ कोको, शोधकर्ता और अन्य शुभ सामग्री भी उत्पादित की गई थी। विवाह की तैयारियों के साथ गैर-सरकारी संगठन प्राप्त हुआ। @मांगोड़ी, जाहिन और थाम @विवाह पूर्व की इन स्थानीय परंपराओं का संबंध परिवार, घरेलू स्टूडियो और शास्त्रीय आश्रम से था। @जीमण वार एवं रेवड़ा पूजन@विवाह से पूर्व संबंधों और समाजजनों के सत्कार और भोजन संबंधियों का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य आत्मीयता और सामाजिक दृष्टिकोण को पूरा करना था। @बिंदोरी @बिंदोरी विवाहोत्सव की सार्वजनिक अभिव्यक्ति थी। इसमें वर या वधू को आवासीय कर आवासीय नगर में घुमाया गया था। यह उत्सव, उल्लास और सामाजिक आतिशबाजी का प्रतीक था। @चक @महिलाएं मंगलगीत गाते हुए कुम्हार के यहां जाती हैं और चाक का पूजन करती हैं। विवाह में संयुक्त मिट्टी के बर्तनों का सम्मान अस्वीकृत कर दिया गया। यह परम्परागत श्रम के सम्मान और लोकजीवन की झलक प्रस्तुत करता है। @भात @भात खंडेलवाल समाज की अत्यंत महत्वपूर्ण उत्सव थी। इसमें मामा पक्ष की विशेष भूमिका थी। माँ द्वारा वस्त्र, आभूषण, मिठाई और अन्य उपहार उपलब्ध कराये गये। भाट केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि मातृकुल के स्नेह, सम्मान और उत्तरदायित्व का प्रतीक था। @फराह का चार एवं ग्रामवासी @विवाह के लिए आवश्यक सामग्री, वस्त्र, मेवा एवं अन्य वस्तुएं उपलब्ध करायी जाती हैं। इन रैलियों के माध्यम से बनारसी और सामाजिक सहयोग की भावना उत्पन्न हुई थी। @तेल, हल्दी और प्रतिबंध @विवाह से पूर्व तेल और हल्दी की समीक्षा की जाती है। परिवार की महिलाएं मंगल गीत गाते हुए वर और वधु को हल्दी लगाती हैं। @हल्दी को शुद्धि, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक माना गया है। यह विवाह समारोह के उत्सवी माहौल की शुरुआत मानी जाती है। @____________________________________________ @ब्रोकर और बारात @विवाह के दिन वर की ब्रोकरेज होती है। पारंपरिक रूप से वर घोड़े पर सवार होकर बैंड, ढोल, शहनाई और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ बारात रवाना की जाती थी। @किसान केवल एक समारोह नहीं, बल्कि परिवार और समाज के सम्मान और गौरव का प्रतीक था। @____________________________________________ @तोरण, मिलनी और स्वागत @वधू पक्ष के द्वार पर तोरण जाना जाता था। वर द्वारा तोरण स्पर्श या तोरण किरण की झलकियाँ प्रकाशित होती थीं। @इसके बाद दोनों स्टार्स के प्रमुख लोगों की मिलनी थी। मिल्नी का उद्देश्य परिचय, सम्मान और गुरुगति को अभिव्यक्त करना हुआ था। @____________________________________________ @चौरी और मंडप व्यवस्था @विवाह मंडप को पारंपरिक रूप से अत्यंत पवित्र माना जाता था। चौरी विदाना विवाह की महत्वपूर्ण क्रांतियों में से एक थी। पैग़ाम में वैदिक विधि से सभी आवश्यक धार्मिक व्यवस्थाएँ स्थापित की गईं। @पैगाम केवल विवाह स्थल नहीं, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों का केंद्र माना जाता था। @__________________________________________ @फेरे और सप्तपदी @अग्नि को साध्य वर-वधु सप्तपदी ग्रहण करते थे। फेरे विवाह संस्कार का मूल और सबसे महत्वपूर्ण अंग माने जाते हैं। @सप्तपदी के माध्यम से दोनों जीवनपर्यंत सहयोग, सम्मान, धर्मपालन, परिवारदायित्व और एकता निष्ठा का उत्तर संकल्प लेते हैं। @वैदिक परंपरा में सप्तपदी पूर्ण होने के बाद विवाह संस्कार अभिलेख माने जाते हैं। @__________________________________________
वैवाहिक प्रतिज्ञाएँ
पुरानी परम्पराओं में वर और वधू को विशेष प्रतिज्ञाएँ भी कराई जाती थीं। इनमें पारिवारिक जीवन, आर्थिक उत्तरदायित्व, सामाजिक आचरण, धार्मिक मर्यादा तथा पारस्परिक सम्मान से सम्बन्धित निर्देश सम्मिलित होते थे।
इन प्रतिज्ञाओं का उद्देश्य दाम्पत्य जीवन को स्थिर, संतुलित और उत्तरदायी बनाना था।
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लोकगीत और नारी संस्कृति @खंडेलवाल विवाह परंपराओं में नारी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। बन्ना-बन्नी, मंगल गीत, हास्य गीत, भाट गीत और फेयरीवेअर के माध्यम से लोकसंस्कृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रहती है। @इनमें समाज का इतिहास, लोकज्ञान, पारिवारिक भावनाएँ और सांस्कृतिक स्मृतियाँ संरक्षित हैं। @____________________________________________ @विवाह का सामाजिक महत्व @विवाह केवल धार्मिक संस्कार नहीं था, बल्कि सामाजिक संगठन का भी महत्वपूर्ण माध्यम था। सगाई से लेकर विदाई तक प्रत्येक बारात का उद्देश्य परिवार, नागाबाटी और समाज के विभिन्न समूहों को एक सूत्र में बांधना था। @यही कारण है कि खंडेलवाल समाज की विवाह परंपरा उनकी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण अंग मानी जाती है। @13.5 विवाह परंपराएं @कालखंड : परंपरागत समाज से वर्तमान तक @खंडेलवाल समाज में विवाह केवल फेरे प्रारूप तक सीमित नहीं माना जाता था। विवाह के अंत में भी कई धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक क्रांतियों की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य नवविवाहित दम्पति को परिवार और समाज में स्वीकृत करना स्थापित करना था। इन समारोहों में पारिवारिक स्नेह, लोकसंस्कृति, हास्य-विनोद और सामाजिक आदर्श का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। @____________________________________________ @फेयरवेल @विवाह का सबसे अधिक समानता वाला संस्कार माना जाता है। यह एकमात्र कन्या के लिए प्रस्थान का अवसर नहीं है, बल्कि उसके जीवन का एक नया अध्याय भी होता है। विदाई के समय माता-पिता, परिवारजन और त्रिपुरा नवदम्पत्ति को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। लोकगीतों और मंगलकामनाओं के बीच कन्या अपने नए घर की ओर प्रस्थान करती है। @भारतीय परिवार व्यवस्था में विदाई केवल एक सामाजिक क्रांति नहीं है, बल्कि वास्तुकला, सांस्कृतिक और पारिवारिक लोकतंत्र की अभिव्यक्ति भी मानी जाती है। @____________________________________________ @गृह प्रवेश एवं माता पूजन @वर के गृह स्थान पर नववधू का परम रीति से स्वागत किया जाता है। अनेक स्थानों पर आरती शिलालेख, मंगल गीत गाने और गृह प्रवेश के जुलूसों की परंपरा रही है। इसके बाद कुलदेवी या गृहदेवता के समतुल्य माता का पूजन किया जाता है, जिससे नवदम्पत्ति के सुख और मंगलमय जीवन की कामना की जाती है। @गृह प्रवेश का उद्देश्य नववधू का परिवार में सम्मानपूर्वक स्वागत करना और उसे नए परिवेश से आत्मीय रूप से जोड़ना होता है। @____________________________________________ @सिर गुंठी @खंडेलवाल समाज के विशिष्ट लोकपरंपराओं में "सर गुंथी" का विशेष स्थान है। यह महोत्सव नववधू के मुस्लिमों में से एक है। इसका उद्देश्य नववधू को परिवार की परंपराओं और नए वातावरण से परिचित कराना और उसे परिवार का सिद्धांत अंग स्वीकार करना है। @इस अवसर पर परिवार की महिलाएं मंगल गीत गाती हैं और नववधू को आशीर्वाद प्रदान करती हैं। यह समारोह केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि पारिवारिक आत्मीयता का प्रतीक है। @____________________________________________ @माडा उपनि
माड़ा उपनी विवाहोत्तर परम्पराओं का एक महत्वपूर्ण अंग रही है। विभिन्न क्षेत्रों में इसके स्वरूप में कुछ भिन्नताएँ देखने को मिलती हैं, किन्तु सामान्यतः यह नवदम्पत्ति के सामाजिक स्वागत और पारिवारिक स्वीकार्यता से जुड़ी रस्म मानी जाती है।
इस अवसर पर रिश्तेदारों और समाजजनों का आगमन होता है तथा नवदम्पत्ति को शुभाशीष प्रदान किए जाते हैं।
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जुवाजुई और हास्य-विनोद की परम्पराएँ
विवाहोत्तर रस्मों में जुवाजुई, जूती चुराई तथा अन्य मनोरंजक परम्पराएँ विशेष लोकप्रिय रही हैं। इनका उद्देश्य नववधू और वर के मध्य संकोच को कम करना तथा दोनों परिवारों के बीच आत्मीयता बढ़ाना होता था।
इन रस्मों में परिवार की महिलाएँ और युवा सदस्य सक्रिय भाग लेते थे। हास्य, परिहास और लोकगीतों के माध्यम से विवाह समारोह को उत्सवमय स्वरूप प्रदान किया जाता था।
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तिलचावली और सामाजिक परिचय
तिलचावली जैसी रस्मों के माध्यम से नववधू का विस्तृत पारिवारिक और सामाजिक परिचय कराया जाता था। इससे वह परिवार और रिश्तेदारी के विभिन्न सदस्यों को जानने और समझने लगती थी।
संयुक्त परिवार व्यवस्था में इस प्रकार की रस्मों का विशेष महत्व था क्योंकि परिवार का आकार बड़ा होता था और नववधू के लिए सभी सम्बन्धों को समझना आवश्यक माना जाता था।
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गौना
पूर्वकाल में अनेक स्थानों पर विवाह और गृहस्थ जीवन के वास्तविक प्रारम्भ के बीच समय का अंतर रखा जाता था। गौना इस प्रक्रिया का अंतिम और महत्वपूर्ण चरण माना जाता था।
गौना सम्पन्न होने के पश्चात वधू स्थायी रूप से पति के गृह में आकर गृहस्थ जीवन का प्रारम्भ करती थी। यद्यपि आधुनिक समय में गौना की परम्परा अधिकांश क्षेत्रों में समाप्त अथवा प्रतीकात्मक रह गई है, फिर भी ऐतिहासिक दृष्टि से इसका सामाजिक महत्व अत्यधिक रहा है।
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साबनी, पहिरावनी और अन्य परम्पराएँ
साबनी, पहिरावनी, पलकाचार, डींग जुहारी, फेरपाटा तथा अन्य स्थानीय रस्में भी विवाहोत्तर जीवन का हिस्सा रही हैं। इन परम्पराओं का उद्देश्य नवदम्पत्ति को समाज में सम्मानपूर्वक स्थापित करना तथा दोनों परिवारों के सम्बन्धों को और अधिक सुदृढ़ बनाना था।
इन रस्मों के माध्यम से नवविवाहित दम्पत्ति को परिवार की परम्पराओं, सामाजिक उत्तरदायित्वों तथा रिश्तेदारी व्यवस्था से परिचित कराया जाता था।
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उपसंहार
विवाहोत्तर परम्पराओं का उद्देश्य नवदम्पत्ति को परिवार एवं समाज में स्थापित करना, रिश्तों को सुदृढ़ बनाना तथा पारिवारिक जीवन के लिए आवश्यक सांस्कृतिक एवं सामाजिक मूल्यों से परिचित कराना था। यद्यपि समय के साथ इन परम्पराओं के स्वरूप में परिवर्तन आया है, तथापि उनका सांस्कृतिक महत्व आज भी बना हुआ है।
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