*रीति-रिवाज़ों के पन्ने अब, मोबाइल स्क्रीन में स्क्रॉल हो जाते हैं Share on

*रीति-रिवाज़ों के पन्ने अब, मोबाइल स्क्रीन में स्क्रॉल हो जाते हैं*,

*अपनों की महफ़िल में बैठे भी, सब ऑनलाइन खो जाते हैं*।

*विवाह, व्यापार, संस्कार, परिवार—समाज का दर्पण थे*,

*अब स्टेटस, चैट और नोटिफिकेशन, रिश्तों में खो जाते है*।

*वो मर्यादा, वो अनुशासन, वो गोत्रों का अभिमान कहाँ*?

*एआई के इस तेज़ दौर में, अपनी जड़ों का ध्यान कहाँ*?

*कल चौपालों में संवाद थे, आँगन में अपनापन था*,

*अब हर चेहरा प्रोफ़ाइल बनकर, बस डिजिटल दर्पण हो गया*।

*संयुक्त परिवारों की शाखाएँ, बरगद सी लहराती थीं*,

*अब फ्लैटों की सीमित दीवारें, रिश्तों को तरसाती हैं*।

*जब घर की देहरी छूट गई, संस्कृति भी पीछे छूट गई*,

*सुविधाओं की अंधी दौड़ में, पहचान हमारी टूट गई*।

*मकान बड़े, संसाधन ऊँचे, तकनीक नई अपनाई है*,

*पर दिल के आँगन में अक्सर, रिश्तों की धूप पराई है*।

*यदि जड़ों को ही भूल गए तो, शाखाएँ कब तक जीवित होंगी*?

*संस्कारों की नमी बिना ये, पीढ़ियाँ कैसे पुष्पित होंगी*?

*क्या केवल डेटा, डिग्री, दौलत से समाज खड़ा रह पाएगा*?

*या प्रेम, परंपरा, संगठन ही भविष्य नया बनाएगा*?

*वक़्त अभी भी हाथों में है, चेतो, पहचान बचानी है*,

*एआई के इस युग में भी, मानवता फिर से लानी है*।

*सिर्फ़ आधुनिक बनना ही नहीं, मूल्यों को भी साथ रखना होगा*,

*समाज की बिखरी इस माला को, फिर से मिलकर गूँथना होगा*।

*तय तुमको करना है अब ये*—

*बस दर्शक बन समय बिताओगे*?

*या संस्कारों की पतवार थाम*,

*समाज-नैया के खेवनहार कहलाओगे*?

— डॉ. अशोक खंडेलवाल चिकित्सा संसार 

9425092492